यही पुस्तक पढ़ी थी जो कि मेरी किन्नौर यात्रा के साथी आर्यन द्वारा मुझे पढ़ने के लिए दी गयी । पुस्तक में भारत के सबसे बड़े घुमक्कड़ राहुल संस्कृतयस्यां जी द्वारा शिमला से किन्नौर की वर्ष 1948 में आज़ादी के तुरंत बाद ही पैदल की गई अपनी यात्रा का सुंदर वर्णन किया गया । इधर चूंकि चकराता ब्लॉक की सीमा हिमाचल प्रदेश से लगी हुई है और चकराता ब्लॉक के लगभग सभी जाने पहचाने स्थानों की यात्रा पैदल ही या सड़क मार्ग से कर लिए जाने और अब साल 2021 में यहां 6 साल पूरे होने पर किसी दूसरी जगह ट्रांसफर भी होने से पहले हिमाचल के भी कुछ स्थानों को देखने की इच्छा भी बलवती हो रही थी ।
घूमने के शौकीन लोगों के बहुत सारे फेसबुक गरौपों से जुड़ने के बाद कुछ नाम मस्तिष्क में ऐसे छप से गए कि जिनके बारे में अलग अलग लोगों के यात्रा वर्णन पढ़ने के बाद ऐसी ही यात्रा करने का मन अपना भी हो चला ।
रोहड़ू से थोड़ा पहले पब्बर नदी के किनारे यह मंदिर
इधर संयोगवश 7 अप्रैल को त्यूणी किसी काम से आना भी हो गया और फिर दिखाई दिया कि 10 अप्रैल से 14 अप्रैल तक की सरकारी छुट्टी भी है बीच मे 12 अप्रैल 01 दिन की छुट्टी यदि ली जाय तो 5 दिन मिल रहे हैं । यह एक अच्छा मौका भी बन रहा था कि इस यात्रा को पूरा किया जाय । आर्यन जी से बात हुई वह भी घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं और सहर्ष ही तैयार हो गए । हमारा प्लान 10 अप्रैल 21 को त्यूणी से ही इस यात्रा पर निकलने का था पर आर्यन जी के परिवार में कुछ घटना होने के कारण 11 अप्रैल को ही त्यूणी से सुबह साढ़े आठ बजे निकलना हुआ । आर्यन जी की कुछ रिश्तेदारी हिमाचल में है और त्यूणी के लोगों का हिमाचल के रोहड़ू आना जाना बना ही रहता है जो कि त्यूणी से लगभग 40 किलोमीटर पड़ता है अतः रोहड़ू तक जाने के बाद कहाँ और कैसे कितना जाना है यह आर्यन जी को भी ज्यादा पता नहीं था । इसी बीच आर्यन जी ने सांगला की जानकारी जुटाई जो कि उनके गांव की बहन के घर वालों से पता लगी जिसकी शादी सांगला के पास ही के गांव कामरु हो चुकी थी । उन लोगों के नंबर भी मिल ही गए । अब हमारे पास इस यात्रा को करने के लिए तीन सहायक तत्व बन गए थे । फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लगातार आ रहे इन स्थानों के यात्रा वृतांत और फ़ोटो, राहुल जी की 1948 में लिखी पुस्तक और हिमाचल के किन्नौर के ये लोग ।
त्यूणी से हमारी यात्रा का पहला पड़ाव रोहड़ू ही हुआ क्योंकि आर्यन जी की गाड़ी का बीमा खत्म हो चुका था जिसे दोबारा करवाना जरूरी था और इसको करवाने के ही बाद हम आगे रामपुर बुशहर के लिए बढ़ सके ।
रोहड़ू एक बहुत बड़ा शहर है जिसे देख कर यही लगा कि हम उत्तराखंड के लोग त्यूणी को इतना दूर समझते हैं वहीं हिमाचल में बड़ी दूर दूर के इलाकों में भी काफी विकसित स्थान मौजूद हैं । रोहड़ू से बाहर निकलते ही सड़क के दोनों और सेब के बागों की जो कतार शुरू हुई उसके थमने का नाम ही नहीं आ रहा था । आजकल सेब के पेड़ पर फूल भी आ रहे हैं जो कि सफेद और कुछ गुलाबी से भी लग रहे हैं ।
पूरे के पूरे पहाड़ों के ढलान पर बड़ी ही मेहनत से ऊपर से नीचे तक सेब ही सेब । इन्ही बागों के बीच हिमाचली शैली के प्रायः हरे और लाल से रंग की टिन की छत के बड़े बड़े मकान ऊपर से नीचे तक बने यहां कहाँ दिखाई पड़ते रहे । रोहड़ू से रामपुर वाले रास्ते पर सुंगरी नामक स्थान तक चढ़ाई ही थी जो कि लगभग रोहड़ू की 1500 मीटर की ऊंचाई से सुंगरी की 2500 मीटर की ऊंचाई तक चली । यह रास्ता हरियाली से भरपूर और सेब बेल्ट ही था ।
जिसे जहां भी पहाड़ पर थोड़ा सा भी स्थान मिला सेब के पेड़ ही लगा दिए गए । यहां यह भी आश्चर्य होता है कि इतनी बड़ी मात्रा में सेब की खेती कहीं भविष्य में पहाड़ों की भी खेती किसानी का स्वरूप ही न बदल दे जैसा कि पंजाब की किसानी में आये अंतर से पता चलता है जहां कि बड़े किसानों ने मात्र गेहूं और चावल की ही खेती बड़े पैमाने पर करनी शुरू कर दी और फसल चक्र व भूतल जल के दोहन, कीट नाशकों के बड़े पैमाने पर उपयोग से अलग ही प्रकार की समस्या होती दिख रही है ।
इसी समस्या का सामना आने वाले समय में पहाड़ भी कर सकते हैं जहां अब परंपरागत उगने वाले अलग अनाज जैसे मंडुआ, चौलाई, अलग अलग डालें, राजमा, उरद, कुल्थी, आलू, अदरक, मटर, टमाटर आदि के स्थान पर अब सिर्फ सेब ही सेब उगाया जा रहा है और अब इन सभी अनाजों के लिए पहाड़ के गांव के भी लोग बाजार पर निर्भर हो गए हैं । अपने पहाड़ों के भृमण में में कई बुजुर्गों महिला और पुरुषों को कहते सुन भी चुका हूं कि कैसे बरसों पहले उनके बचपन व जवानी के दिनों में उनके घर के अनाज के कोठार इन सभी फसलों से भरे रहते थे और घर मे घी और दूध की कोई कमी नहीं रहती थी । पर अब आज की पीढ़ी इतनी मेहनत नहीं कर सकती और दूसरा इन फसलों के उत्पादन में जरूरी मानव श्रम भी अब उपलब्ध नहीं है । सीमित परिवार के चलन ने भी पहाड़ की इस परंपरागत खेती को कहीं न कहीं प्रभावित जरूर किया है जहां अब 01 या 02 ही पुत्र हैं और वे भी अधिकतर पढ़ लिख कर नौकरी करने बाहर चले जाते हैं और गांव में पीछे रह गए बुज़ुर्ग अब इस खेती को कितना संभालें । इसी कारण से अब या तो पहाड़ के खेत बंजर हो रहे हैं या फिर उन पर सेब या अन्य नकदी फसल ही उगाई जा रही है । मेरे ही 6 सालों के चकराता के कार्यकाल में कई गांव में सेब की खेती का प्रचलन हिमाचल से होता हुआ शुरू हो गया है । खैर यही शायद परिवर्तन है जो कि मैदान बहुत पहले ही देख चुके हैं और पहाड़ अब इसे देख रहे हैं ।
हमने अपनी यात्रा सर्फ चाय ही पीकर शुरू की थी और सुगरी पहुंच कर वहां की ठंड ने कहीं रुक कर कुछ खाने और चाय पीने को लालायित कर दिया । सुंगरी शायद एक अड्डा जैसा ही है कुछ ही दुकानें खुली दिखाई दी । हम एक छोटी सी दुकान में गए और दाल और चावल खाये जो कि काफी अच्छे लगे ।
सुंगरी से अब नीचे ढलान ही था जहां रोहड़ू से सुंगरी तक बढ़िया सड़क मिली किन्तु सुंगरी के बाद सड़क कच्ची ही थी और कहीं कहीं पर काफी खराब भी । नीचे उतरने के क्रम में ऊंचाई घटती ही गयी व गर्मी भी बढ़ी । एक सीमा तक के ढलान के बाद सड़क फिर ऊंची उतनी शुरू हुई और एक स्थान पर नीचे का बहुत बढ़िया दृश्य देखने को मिला जहां से सतलज की घाटी के पहली बार दर्शन हुए जिस सतलज के ही किनारे किनारे अब अगला रिकांग पीओ नामक स्थान का सफर करना था ।
पता नहीं क्यों अक्सर लोग पहाड़ों के इन ऊंचाई वाले स्थानों जो कुछ खतरनाक जैसे तो होते ही हैं किंतु नीचे का दृश्य जिनका बहुत बढ़िया होता है को सुसाइड पॉइंट बोल देते हैं । वहीं कुछ युवा खाते पीते दिखाई दिए और बोले कि जी यह सुसाइड और लवर्स पॉइंट दोनो ही है । नीचे दिख रहे कुछ स्थानों की जानकारी उनसे मिली नीचे एक बड़ा सा स्थान दत्त नगर उनके द्वारा बताया गया । खैर अब नीचे ढलान ही पर उतरना था और ढलान खत्म होते ही यह रोड शिमला से रामपुर और फिर आगे किन्नौर हाईवे से जा मिली । नीचे काफी गर्मी भी लगी और सड़क बहुत ही चौड़ी मानों कि हम प्लैन के ही किसी स्थान पर यात्रा कर रहे हों । यह स्थान रामपुर बुशहर था । जो कि शायद रविवार होने के कारण काफी कुछ बन्द सा ही दिखाई दिया । फ़ोन पर इस स्थान की ऊंचाई मात्र 900 मीटर ही पाई गई । रामपुर में रुक कर संयोगवश यहां के राजा का महल और एक नरसिंह भगवान का मंदिर देखने को मिल गया । रामपुर एक रियासत रह चुकी थी तो यहां के राजाओं ने यहां काफी सारे भवन बनाये जिनमे अब ज्यादातर सरकारी दफ्तर चल रहे हैं । यहां के डाकखाने और पुलिस थाने ऐसे ही विलक्षण भवनों में चल रहे हैं । रामपुर में एक छोटी सी दुकान पर रुक कर चाय पीने के बाद अब हमारा सफर सतलज के किनारे किनारे शुरू हुआ । यह जिला शिमला ही चल रहा था । आगे किन्नौर जिले का प्रवेश द्वार मिला जसके बाद सड़क की चौड़ाई कम, सतलज की गहराई ज्यादा और सड़क थोड़ी खतरनाक सी होती दिखाई देती चली गयी । इधर सड़क की भी ऊंचाई बढ़ रही थी अब अत्यंत ही विलक्षण दृश्य दिखाई देने शुरू हो गए सबसे पहला तो चट्टान को काट कर बीच से सड़क निकले जाने का स्थान जहाँ पर देख कर लगता है कि किसी दरवाजे से होकर सड़क जा रही है । इस स्थान का जिक्र यू टूबर बहुत ही खतरनाक और अचंभित कर देने वाले स्थान के रूप में करते हैं । और इस दरवाजे या छोटी सी गुफा का फोटो बड़ा का आकर्षण व कौतूहल उत्पन्न करता भी है और हर देखने वाले के मन मे यह इच्छा जरूर उत्पन्न करता होगा कि कब यहां से गुजरना होगा । खैर जब यह अक्सर सोशल मीडिया पर दिखने वाला यह स्थान हमको भी दिखा तो हमे भी आश्चर्य हुआ और हमने आराम से रुक कर यहां खूब सारे फ़ोटो लिए और वीडियो भी बनाई ।
[14/04, 03:17] Pankaj Kumar: अगला आश्चर्य सड़क का वह हिस्सा था जिसके ऊपर चट्टान एक छत की भांति दिखाई पड़ रही थी, चट्टान को पूरा काटना संभव न होने के कारण उसे इतना खुरच दिया गया कि वहां सड़क बन सके यह क्रम इस रोड पर काफी लंबा चला और हमारे फ़ोन ऐसे चित्रों व वीडियो से भर गए । खैर आगे बढ़े अब अंधेरा होना शुरू हो गया था, नीचे नदी के बहाव की तीव्रता कुछ कम सी होती दिखाई दी प्रतीत हुआ कि जैसे नदी को कहीं बांध दिया गया है । सतलज पर बड़ी मात्रा में बांध बनाये जा रहे हैं व बड़े पैमाने पर काम चल रहा है ऐसे ही एक बड़ा बांध रास्ते मे भी आया जिसका नाम करछम बांध था । इसे पार करने के बाद तो अंधेरा हो ही गया था । खैर हम रात्रि लगभग 8 बजे रिकांग पीओ पहुँचे और रुकने की जगह तलाश कर भोजन के बाद सो गए ।