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Sunday, October 30, 2016

पहली हवाई यात्रा :: गोआ की सैर








काफी समय से हवाई यात्रा की इच्छा हो रही थी । फिर इधर जबसे इस क्षेत्र में भी निजी विमानन कंपनियों का आना हुआ है तो किराये में भी काफी कमी आई है तथा जो मधमवर्गीय मेरे जैसे व्यक्ति थे तथा सुपरफास्ट ट्रेन के स्लीपर क्लास में यात्रा करने को ही परम सौभाग्य मानकर खुश हो जाते अब हवाई यात्रा के विषय में सोच सकते थे । किराया मालूम किया । फिर समय का अंदाज लगाया गया कि सफ़र इतना लंबा तो हो कि लगे कि बैठे हैं और थोडा बहुत कुछ खाया पिया भी । वरना आजकल देहरादून से दिल्ली की भी हवाई यात्रा शुरू कर दी गयी है । परंतु उसमे तो यात्री सीट बेल्ट को खोलते ही नहीं होंगे । खैर टिकट बुकिंग इत्यादि होने के उपरांत यात्रा दिवस की बेसब्री से इंतज़ार होने लगी । बच्चे भी काफी रोमांचित थे । खैर यात्रा की तिथि को हम ससमय ही हवाई अड्डे पर पहुँच गए थे क्योंकि अनुभवी लोगो से मिले मार्गदर्शन के अनुसार जांच इत्यादि की प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है । जांच की प्रक्रिया पूरी होने के उपरांत भी लगभग एक घंटे का समय हमारे पास था । तो आदतन सोचा कि तब तक हवाई अड्डे में ही घुमा फिरा जाए ।



 दिल्ली हवाई अड्डे के अंदर भी काफी दुकानें थी । खाने पीने का भी काफी सामान मिल रहा था । भारतीय बच्चे  इस मामले में काफी चतुर होते हैं । घर पर इनको कुछ खिलाओ तो नहीं खाएंगे पर बाहर जाते ही उनको खुल कर भूख लग जाती है । खाने पीने के विभाग का जिम्मा श्रीमती जी को ही दे रखा था । उन्होंने भी पूछा कि बच्चे कुछ खाने की जिद कर रहे हैं । क्या करना ह ? मैंने कहा कि समझा दो कि हमने हवाई जहाज में भी खाने पीने का सामान बुक कर रखा है वहीँ देख लेंगे । पर बच्चे कहाँ मानते हैं प्रायः देखा गया है कि ऐसे अवसरों पर उनकी भूख अक्सर बढ़ जाया करती है जहाँ पर खाने पीने का सामान काफी महंगा होता है । खैर सोचा गया कि ऐसी कोई चीज ले ली जाय जिसको पहले भी खा चुके हों वरना वहां ज्यादातर सामान ऐसे थे जिनके नाम भी मेरे लिए अजनबी थे । आमतौर पर लगभग हर मुद्दे पर अलग राय रखने वाले परिवारी जान एक मुद्दे पर मेरी राय पर सहमत हो जाते हैं । दक्षिण भारतीय व्यंजन खाने के मामले में । विरोध होने की गुंजाइश न देखते हुए साउथ थाली ही माँगा ली गयी जिसको सभी ने बड़े चाव से खाया । 

खैर कुछ समय के बाद हमारी उड़ान हेतु यात्रियों को भेजे जाने की udghoshna हुई । हम तत्काल लाइन में लग गए और अपनी बारी का बड़ी ही व्यग्रता से इंतज़ार करने लगे । आने वाली उड़ान में कुछ समय लग रहा था इस कारण से यात्रियों को भेजा नहीं जा रहा था । इस कारण एक सज्जन आग बबूला हो बैठे और ग्राउंड ड्यूटी करने वाले एक नवयुवक को बुरा भला कहने लगे । युवक उनको हो रही देरी का कारण बड़े ही धैर्य से समझने की कोशिश करता रहा । खैर थोड़ी ही इंतज़ार के उपरांत रास्ता खोल दिया गया और हवाई जहाज तक हमको ले जाने हेतु इंडिगो वालो की ही बस लगा दी गयी । बस में सवार होकर हवाई जहाज के पास पहुंचे । अब हम सबकी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी हवाई जहाज को पास से देखने की तथा उसमे सवार होने की । परंतु उससे पहले इन पलों को कैमरे में कैद भी कर लिया गया ।



 कुछ फ्रीक्वेंट ट्रैवलर हमारे अति उत्साह को देख कर समझ गए तथा हमे फ़ोटो इत्यादि खींचने देने हेतु खुद ही साइड में हो गए । खैर विमान में पदार्पण हुआ हवाई परिचारिका से दुआ सलाम हुई और हम अपनी अपनी सीट पर बैठ गए । छोटी बेटी मेरे पास बैठी और बड़ी अपनी मम्मी के पास । हमने दो सीट खिड़की वाली ली थी ताकि बाहर का नजारा दिखाई दे सके । खैर बैठने के उपरांत भी थोड़े और फ़ोटो खींचे गए । तभी विमान के दरवाजे बंद होने का संकेत मिला और कहा गया कि विमान उड़ान भरने के लिए तैयार है । विमान ने पहले धीमी गति में फिर तीव्र गति से दौड़ना शुरू किया तथा भूमि छोड़ दी और हवा में उड़ना शुरू कर दिया ।





 मै खिड़की से बाहर का नजारा देखने में व्यस्त हो गया और इन पलों को भी कैमरा में कैद करने लगा । कुछ ऊँचाई तक तो दिल्ली की ऊंची ऊंची इमारतें दिखाई देती रही किन्तु फिर और अधिक ऊँचाई पर जाने के बाद भूमि के ऊपर बादलों का एक आवरण सा छा गया जिसके कारण नीचे का कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया । विमान की उड़ान से पहले चालक दल द्वारा अपना तथा केबिन क्रू का परिचय दिया गया इसके साथ साथ ही विमान परिचारिका ने बहुत ही अनूठे अंदाज में किसी भी आपात स्थिति में विमान से निकलने के तरीके तथा अपनी अपनी सीट बेल्ट बांधे जाने की हिदायत दी । लड़ने वाले सज्जन को परिचारिका महोदया द्वारा बार बार टोका गया तब कहीं जाकर उन्होंने अपनी सीट बेल्ट बाँधी । विमान अब दिल्ली के ऊपर पहुँच गया था तथा अब नीचे कि सभी चीजें छोटी छोटी दिखाई देनी शुरू हो गयी थी. 

थोड़ी देर के उपरांत विमान परिचारिकाओं ने खाने पीने कि ट्राली विमान के बीच में घुमानी शुरू कर दी थी. वैसे तो रास्ता ज्यादा लम्बा नहीं था किन्तु ट्रेन के सफ़र के अनुभव को देखते हुए मुझे लगा कि अपने पास खाने पीने का कुछ न कुछ सामान जरुर होना चाहिए, क्योंकि बच्चों को सफ़र में कुछ न कुछ खाना जरुर अच्छा लगता है. हमने शाकाहारी सैंडविच, एक शीतल पेय और मैंने अपने लिए काफी लेना पसंद किया. परिचारिकाओं से सभी को खाद्य पदार्थ दिए और अपना कार्य समाप्त कर लिया. अब विमान मुंबई लैंड करने वाला ही था. मुंबई को मैं 2005 में छोड़ चुका था, और अब काफी कुतूहल मुझे भी था कि ऊपर से मुंबई कैसा दिखाई देता होगा. मैं मुंबई के कुछ लैंड मार्क्स तलाश करने लगा और मुझे दिखाई दिया वरली, वाला सी लिंक जिसे मेरे आने के बाद बनाया गया था. मुझे उम्मीद थी कि गेट वे ऑफ़ इंडिया और अपना कोलाबा एरिया भी दिखाई देगा परन्तु तभी विमान कि लैंडिंग हो गयी. कुछ यात्री नीचे उतरे और करीब आधा घंटा ठहरने के बाद विमान फिर से उड़ान भरने के लिए तैयार हुआ. इसी बीच मैं मुंबई कि हवा में ११ साल फिर से सांस लेने के लिए विमान के गेट तक आया, मुंबई को वही चिर परिचित हवा कि गंध, जिसमे समुद्र कि नमी और मछलियों कि गंध मिली होती है. तभी विमान परिचारिका ने मुझे अपनी सीट पर बैठ जाने कि हिदायत दे डाली. मैं वापस आ गया. विमान ने गोवा के लिए उड़ान भरी, अब यात्रियों में कुछ पर्यटक और कुछ युवा जो शायद गोवा के ही निवासी थे शामिल हुए. करीब 40 मिनट कि उड़ान के बाद विमान गोवा के ऊपर  पहुँच गया, गोवा में मैंने नौसेना के दिनों की शुरुआत में 03 साल साल 1991 से 1994 गुजारे थे. मैं बहुत उत्सुक था कि क्या विमान से नीचे कि कोई जगह मैं पहचान सकता हु, मुझे कुछ परिचित से लैंड मार्क दिखाई दिए. इसी बीच विमान ने वास्को डी गामा हवाई अड्डे पर लैंडिंग कर दी. हवाई अड्डे पर काफी परिवर्तन दिखाई दिया, गोवा में जब मैं था तब एअरपोर्ट उतना बड़ा नहीं था, किन्तु अब तो सभी कुछ बदल चुका था. मुझे इतने सालों बाद गोवा फिर से आना वाकई काफी अच्छा सा लग रहा था. बाहर आते ही आसपास नजर डाली काफी परिवर्तन आ गया था. अब तक गोवा ट्रेन से ही आने का अनुभव था. उन दिनों गोवा एक्सप्रेस निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से 12.25 पर चल कर तीसरे दिन सुबह सुबह 6.00 बजे वास्को स्टेशन पहुँच जाती थी. कहाँ वह तीन दिनों का सफ़र और कहाँ यह कुछ चाँद घंटो का ही सफ़र, काफी अलग सा अनुभव लगा. कुछ ही घंटो में मौसम और स्थान में इतना बड़ा परिवर्तन देखना काफी अलग सा लगा. ट्रेन में सब कुछ धीरे धीरे बदलता था. दिल्ली से चलकर शाम तक ग्वालियर आते आते कुछ परिवर्तन दीखते थे. अगली सुबह ट्रेन मध्य प्रदेश से होकर महाराष्ट्र में प्रवेश कर जाती थी तो लोगों कि वेशभूषा, बाहर के दृश्य में काफी अंतर दिखाई पड़ता था. दोपहर के समय ट्रेन पुणे पहुँच जाती थी और दिन ढलते ढलते सातारा के घाट से गुजरती थी. रात 8.०० बजे मिरज स्टेशन पर पहुँच कर ब्रॉड गेज कि ट्रेन छोड़ कर मीटर गेज के ट्रेन में सवार होते थे. उन दिनों मिरज रेलवे स्टेशन पर ब्रेड ऑमलेट मिला करता था. वही मेरा डिनर होता था क्योंकि घर से लाया हुआ भोजन तब तक कि यात्रा में समाप्त हो जाया करता थे. पूरी रात के सफ़र के बाद ट्रेन सुबह सुबह वास्को पहुँचती थी. खैर ट्रेन के सफ़र का अपना एक अलग ही आनंद है जो कि हवाई यात्रा में कभी भी नहीं आ सकता. पर इसका भी अनुभव जरुरी था. अपनी विचार तन्द्रा को भंग करते हुए   तभी एक टैक्सी वाले भाई से बात कि और अपने गंतव्य कि और रवाना हुए जो कि गोवा के प्रसिद्ध बीच कोलान्गुते के पास था. 

  

होटल पहुँच कर थोडा विश्राम करने के बाद बच्चे बीच पर जाने कि जिद करने लगे. बीच पर उस समय भी काफी संख्या में पर्यटक मौजूद थे. चूँकि मानसून का समय शुरू हो चुका था तो समुद्र अपने रौद्र रूप में आ चुका था और बीच पर तैनात लाइफ गार्ड्स समय समय पर लोगों को ज्यादा अन्दर न जाने कि चेतावनी दे रहे थे. 


इसी बीच छोटी बेटी ने मौका पाकर बालू में खेलना शुरू भी कर दिया और बड़े ही मनोयोग से कुछ बनाने लगी. गोवा में 04 दिन गुजार लेने के बाद वापसी भी विमान से की गयी. इस बार उड़ान रात कि थी. मैंने सोचा कि दिन और रात दोनों के समय के सफ़र का अनुभव किया जाय. 


इस प्रकार हमारी पहली हवाई यात्रा सकुशल संपन्न हुई. इस यात्रा से काफी कुछ सीखने को भी मिला और बच्चों को भी. अब वो बड़े होने के बाद जरुरत पड़ने पर अकेले ही हवाई यात्रा कर पायेंगे यही मुझे लगा. 

1 comment:

  1. Pankaj bhai you r really a expert thinker & writer. Very nyc keep writting. God bless you bhai

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