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Saturday, October 5, 2019

TREK TO HAR KI DUN









ओसला गांव - एक अलग ही दुनिया
मैंने हर की दून ट्रेक के बारे में काफी लोगों से सुन रखा था । आना जाना कुल मिलाकर कुल 54 किलोमीटर की इस ट्रैक के रास्ते की खूबसूरती के फोटो सदैव मन मे कौतूहल उत्पन्न करते थे कि कभी तो ऐसी जगह जरूर जाना चाहिए । यह स्थान उत्तरकाशी के मोरी ब्लॉक में है और मोरी ब्लॉक की सीमा मेरे चकराता ब्लॉक से लगी हुई ही है । मेरे ब्लॉक का क्षेत्र खत्म होते ही उत्तरकाशी के मोरी ब्लॉक का एरिया शुरू हो जाता है । उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक में कुछ काफी अच्छी ट्रेक हैं जहां पर लगभग बरसात के दिनों को छोड़ कर ट्रैकिंग चलती रहती है और देश विदेश के ट्रेककर आते रहते हैं । पिछले ही माह मुझे केदारकंठा जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । केदारकंठा ट्रेक की शुरुआत सांकरी नाम की जगह से होती है । हर की दून ट्रेक के लिए भी सांकरी ही पहुंचना पड़ता है । इस माह मुझे हर की दून ट्रेक पर भी जाने का मौका मिल गया ।
सांकरी से 11 किलोमीटर आगे तालुका नाम की जगह तक वन विभाग की कच्ची सड़क है जिस पर सिर्फ लोकल लोगों की बोलेरो या यूटिलिटी ही चलती है । तालुका से हर की दून की पैदल दूरी 27 किलोमीटर की है । चूंकि इस पूरे क्षेत्र को गोविंद वल्लभ पंत राष्ट्रीय अभ्यारण्य घोषित किया हुआ है अतः इस क्षेत्र में सड़क निर्माण नही किया गया है ।
तालुका से हर की दून के बीच इस 27 किलोमीटर के मार्ग पर 03 गांव आते हैं जिनके निवासियों को सदियों से बाजार, अस्पताल, उच्च शिक्षा के लिए पैदल ही चलना पड़ता है । और यह पैदल पहाड़ की सीधी खड़ी चढ़ाई, पगडंडी होती है जिस पर आपका ध्यान चूका तो आप नीचे बहती किसी नदी की धारा में खो जाएंगे या किसी गहरी खाई में समा जाएंगे ।
इस मार्ग का अंतिम गांव है ओसला जो कि तालुका से कुल 14 किलोमीटर की पैदल दूरी है आता है और इस गांव से हर की दून की दूरी 13 किलोमीटर ही रह जाती है ।
रास्ते मे और भी 04 गांव पड़ते हैं धाटमीर, गंगाड, पावनी और फिर ओसला । ओसला गांव में मुझे 02 रात बिताने का मौका मिला ।
गांव में सड़क तो है ही नहीं, पिछले डेढ़ महीने से बिजली भी नहीं आ रही है, गांव वाले सोलर की बिजली से अपने घरों में एक दो बल्ब जला लेते हैं । गांव में TV भी कुछ ही लोगों के पास है और किसी भी प्रकार का मोबाइल नेटवर्क यहां नहीं चलता ।
गांव के लोगों का मुख्य धंधा खेती बाड़ी है और भेड बकरी पालना । भेड़, बकरी मांस व उनके बालों के लिए पाली जाती हैं । गांव में मुझे बताया गया कि वर्ष 1975 में ही एक सरकारी प्राथमिक स्कूल खुल गया था तथा वर्ष 2008 में जूनियर हाई स्कूल भी है ।
गांव में स्वास्थ्य, चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं है, छोटे मोटे रोग होते ही नहीं हैं यदि हुए भी तो स्थानीय दवा से ठीक हो जाते हैं, बड़ी बीमारी होने पर मरीज को शहर तक ले जाना बहुत ही मुश्किल बात है । कई बार तो मरीज दुर्गम रास्ते मे ही दम तोड़ देता है ।
गांव में हर आयु की महिलाएं बहुत सारे कामों में लगी रहती हैं, घर के काम के अलावा जंगल से पशुओं का चारा लाना, ईंधन की लकड़ी व पानी भर कर लेना इनकी मुख्य जिम्मेदारी हैं ।
महिलाओं के इन कामों को बहुत ही छोटी से आयु की बच्चियां भी करने लग जाती हैं । इसके अलावा गांव में भेड़ के बालों को तकली पर घुमा कर उसका धागा या ऊन भी तैयार की जाती है और फिर इस धागे या ऊन को गांव में ही हथकरघे की सहायता से कपड़ा बना दिया जाता है जिसकी जैकेट ये लोग पहनते हैं ।
गांव के स्कूल को देखने व बच्चों से बात करके प्रतीत होता है कि ज्यादातर बच्चे कक्षा 8 से या 10 से आगे नहीं पढ़ पाते और जल्दी ही अपने पुश्तैनी कृषि कार्य, भेद बकरी की देखभाल या फिर घोड़े खच्चर पर ट्रेककर का सामान ढोने के काम मे लग जाते हैं ।
एक और हम जैसे शहरों के जीवन मे रह रहे लोगों को सरकार से, व्यवस्था से, अपने आसपास के लोगों से यहां तक कि अपने ही परिवार के लोगों से बहुत सी शिकायतें होती हैं, मुझे यहां के लोग, बच्चे खुश दिखाई दिए । इनके लिए हर दिन एक कठिन परीक्षा जैसा होता है, खासकर बर्फबारी के दिन जब पशुओं का चारा भी लाना मुश्किल हो जाता होगा और उस 14 किलोमीटर के नदी के किनारे के बर्फ से भरे रास्ते को सकुशल पार करना कितना कठिन होता होगा इसका अनुमान भी लगाया जाना मुश्किल है ।
ओसला गांव ने मुझे बहुत कुछ सोचने को मजबूर किया । एक ऐसा गांव जो तथा कथित सभ्यता से दूर होने के बावजूद भी आबाद है, चहल पहल है, गांव में हर आयु वर्ग के स्त्री, पुरुष और बच्चे हैं, गांव आज भी अपने कुछ पुराने रीति रिवाजों, पुरानी प्रथाओं, श्रम विभाजन, जजमान प्रथा पर चल रहा है, जहां हर एक व्यक्ति अपने अस्तित्व के लिए दूसरे पर निर्भर है ।
ओसला गांव में मोबाइल नेटवर्क का न होना शायद उस युवा को उस सपनो की आभासी दुनिया में न ले जाकर अपनी जड़ों से जोड़े रखता है । जहां उसका परिवार, दोस्त व पड़ोसी ही उसके सुख दुख के साथी हैं ।
ओसला गांव से सड़क की 14 किलोमीटर की आज की दूरी जो पहले कभी 30 या 40 साल पहले 50 किलोमीटर से भी ज्यादा हुआ करती थी इस गांव के निवासियों को आपस मे जोड़े रखती है, यहां एक गांव के अलग अलग परिवार के लड़का और लड़की आपस मे शादी कर सकते हैं, अड़ोसी, पड़ोसी, आपस में रिश्तेदार हैं ।
जिस घर मे मैं रुका, उस महिला का maika उसी गांव में था, घर के मालिक की दोनों बहनों की शादी भी उसी गांव में हो रखी है और उसकी अपनी ही साली उसके छोटे भाई की पत्नी है ।
यानी एक जुड़ा हुआ गुंथा हुआ सा सामाजिक जीवन जिसे जोड़े रखने के लिए किसी भी बाहरी चीज की जरूरत नहीं पड़ती, सड़क की भी नहीं, जो शायद गांव को तो सभ्यता से जोड़ देती पर लोगों को अपने ही आसपास के लोगों से तोड़ भी देती, अलग सा कर देती ।
ओसला गांव का युवा कक्षा 5 के बाद पढ़ाई छोड़ कर अपने पुश्तैनी काम मे लग जाता है, और गांव में ही रह कर अपने बुज़ुर्ग माँ, बाप के पास रह कर गांव की ही लड़की से शादी कर गांव ही में रह लेता है । 10वीं या 12 वीं किसी तरह पास कर नौकरी की तलाश में नहीं भटकता । पहाड़ों में सड़क से जुड़े ऐसे भी गांव मैंने देखे हैं जहां मुझे सिर्फ बुज़ुर्ग और बच्चे ही मिले और युवा गांव से बाहर शहरों में चले गए हैं, ऐसे भी बहुत से सड़क से जुड़े गांव हैं जहां आज सिर्फ बुज़ुर्ग ही लोग बच रहे हैं ।
आज से 20 साल बाद के ओसला गांव को देखना अपने आपमे सचमुच ही एक अनुभव होगा जब इस गांव में सड़क, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा सभी कुछ होगा लेकिन गांव में इनको उपयोग करने वाला कोई होगा भी या नहीं होगा ।





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