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Thursday, May 22, 2014

जैसलमेर तथा बाड़मेर की यात्रा

हमारी जैसलमेर यात्रा

बहुत दिनों से सोच रहे थे कि कही घूम कर आया जाए. ऐसा अवसर ही प्राप्त नहीं हो पा रहा था. कारण आर्थिक भी थे तथा सामाजिक भी. आर्थिक समस्या जब सुलझी तो सोचा कि अब और नहीं अब टी कहीं न कहीं  जाना ही है, क्योंकि मैं इधर देख रहा था कि नौसेना की नौकरी छोड़ने के बाद एवं रूडकी रहना शुरू करने के बाद कहीं जाया ही नहीं गया था तथा इसलिए लम्बे सफ़र से डर सा भी लगने लगा था . मैंने इस यात्रा के लिए अक्टूबर के महीने का चुनाव इसलिए किये कि सफ़र में ज्यादा गर्म कपडे भी नहीं रखने पड़ेंगे, क्योंकि भाई मध्यम वर्गीय परिवार बिन तथा बन्दे की पूरी आस्था समाजवाद में है इसलिए समाजवादी विचार पर आस्था रखते हुए स्लीपर श्रेणी में ही जाने का प्लान बनाया. 


जब बच्चो को पता चला तो वे भी बड़े खुश हुए कि चलो स्लीपर क्लास की कम से कम खिड़कियाँ खुल तो जाती हैं, और बस या रेल के सफ़र का मजा ही जब आता है जब आपको सीट खिड़की की मिल जाए. मुझे याद आता है नौसेना की नौकरी के दौरान जब एक बार मुझे उडुपी से दिल्ली तक राजधानी एक्सप्रेस गाडी में ए.सी. 3 स्लीपर में यात्रा का अवसर (मुफ्त में) प्राप्त हुआ था तो बड़ी बेटी उस समय 02 वर्ष की थी गाडी में बैठते ही फटाफट खिड़की पर पहुंची तथा अपनी तोतली आवाज में बोली पापा जल्दी से डिंग-डोंग खोल दो (विंडो को वह ऐसा कह कर बोल रही थी). अब मेरे सामने यक्ष प्रश्न कि इस बच्ची को कैसे बताया जाए कि बेटा यह महँगी वाली ट्रेन है तथा इसमें ऐसे ही  बैठ कर जाया जाता है . बेटी बड़ी नाराज हुई बोली यह तो ख़राब ट्रेन है इसमें क्यों बैठे, मैं उसी दिन समझ गया था कि बच्ची में अपने पापा के समाजवादी विचारों का  समावेश हो चुका है. 
खैर साब अब बात इस सफ़र  की करते हैं, हमारा आरक्षण रात की गाडी में था जो हरिद्वार से चलती है तथा सीधे बाड़मेर तक जाती है. धर्मपत्नी ने जाने की सारी  तैयारी कर ली थी (सबसे बड़ी तैयारी सफ़र के दौरान खाने पीने की व्यवस्था करने की होती है) तथा इस कार्य में हमारी लेडीज एकदम एक्सपर्ट होती हैं पूरी, आलू वगैरा बन गए तथा बच्चों के लिए भी काफी मात्रा में चिप्स आदि सामन रख लिया गया था. बच्चों में ऐसा देख जाता है कि चाहे हमारा सफ़र बस या ट्रेनमें थोड़े से ही समय का क्यों न हो बैठते ही उन्हें अचानक भूख लग ही जाती है तो इस संभावना पर विचार हमारी श्रीमति जी ने पहले से ही कर लिया था तथा उनकी उदरपूर्ति की सारे साधन जमा कर लिए गए थे.
अगली सुबह गाडी राजस्थान राज्य में प्रवेश कर चुकी थी. अब ट्रेन की खिड़की से बाहर का नजारा बदलने लगा था दूर दूर तक खाली जमीन जो कि अपने इलाके में असंभव बात है (जनसँख्या घनत्व अधिक होने की कारण) . रास्ते मैं बीकानेर व नागौर जैसे कुछ बड़े स्टेशन पड़े खैर रात करीब आठ बजे हमारी ट्रेन बाड़मेर पहुँच गयी. स्टेशन के पास ही के होटल में कमरे का इंतजाम हो जाने के उपरांत खाने की लिए निकले . 

इस मुद्दे पर भी मेरी समाजवादी विचारधारा तथा बन्दे का पहले से किये गए कई बार के ऐसी यात्राओं का  अनुभव काम आया बन्दे ने स्टेशन सी बाहर निकलते ही एक ढाबा नुमा होटल देख लिया था, खैर उस स्थान का खाना हमें काफी पसंद आया, एक सब्जी तथा एक दाल का आर्डर दिया गया. बड़ी बेटी भले ही सफ़र के मामले में समाजवादी है पर खान -पान पर वह बाजारवादी ताकतों का शिकार हो चुकी है परिणामस्वरूप उसने खाना खाने में शुरुआत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, परन्तु हम सबको खाना न्जोय करते देख उसने भी खाना शुरू किया तो उसे भी खाना पसंद आया. खाना खा चुकने की बाद थोड़ी आईस क्रीम खाई गयी तथा फिर वापस आकर आराम किया क्योंकि अगले सुबह हमें बस द्वारा जैसलमेर के लिए निकलना था. 

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