बाड़मेर पहुँचाने के बाद हमने रेलवे स्टेशन के पास ही एक होटल में रात के लिया ए.सी. कमरा ले लिया था. होटल श्री कृष्णा, रात को तो सभी को काफी अच्छी नींद आई . अगले दिन सुबह ही नहा धोकर तैयार हुए तथा नाश्ता के लिए फिर अपने रात वाले होटल में ही चले गए, वहां हमने नाश्ते में परांठे खाए जो कि काफी स्वादिष्ट थे. हमने जैसलमेर जाने के लिए बस का पता किया पास ही मैं प्राइवेट बस स्टैंड बताया गया वाहन पहुंचे तथा पता किया कि बस कब जायेगी.
बस वाहन लगी हुई ही थी हमने अपना सामन रख दिया तथा खिड़की वाली सीट ले ली. बस भरने में समय लगता देख मेरी छोटी वाली बिटिया ने ड्राईवर साहब की सीट कब्ज़ा ली तथा ऐसे ही बस चलने का उपक्रम करने लगी. थोड़ी देर में बस से कुछ आवाज आई मैंने देखा तो बिटिया रानी ने चाबी घुमा दी थी ड्राईवर महोदय चाबी बस में लगी छोड़ गए थे. खैर बस में धीरे-धीरे यात्री आने शुरू हो गए थे, तभी मैंने एक सज्जन से बात करनी शुरू कर दी थी मेरी आदत है कि मैं सफ़र के दौरान लोगों से बात करने का प्रयास करता हूँ. बात चीत में पता लगा कि वह व्यक्ति उत्तराखंड से ही है तथा उस भाई की कहानी भी पूरी फ़िल्मी थी. वह बचपन में घर सी भाग आया था तथा काफी जगह काम करने के बाद किसी के साथ जैसलमेर आ गया था तथा अब पिछले 20 साल से जैलसमेर में ही रह रहा थे तथा यही शादी भी कर ले थी. उसको भी हमसे मिलकर अच्छा लगा. खैर साब बस शुरू हो गयी बस अच्छी थी तथा किराया भी काफी कम 150 कि.मी. की यात्रा के मात्र 100/- रु. प्रति व्यक्ति. और तो और बच्चों के कुछ भी नहीं लिया गया. यह काफी आश्चर्यजनक था. रस्ते में बस एक स्थान पर रुकी हमने चाय तथा पकोड़ी खायी खाफी स्वादिष्ट थी. इसी बीच हमारे पास वाली सीट पर एक महिला अपने राजस्थानी परिधान में आकर बैठ गयी. घूँघट कर रखा था तथा पूरे रस्ते बेचारी इतनी गर्मी में भी मुंह ढक कर बैठी रही. रास्ते में एक तरफ तो थोड़ी बहुत हरियाली थी किन्तु दूसरी तरफ पूरी रेत ही रेत.
तभी बड़ी - बड़ी पवन चक्कियां भी दिखाई देनी शुरू हो गयी एक के बाद एक बहुत सारी बच्चे उन्हें देखकर बहुत खुश हुए तथा मुझे बच्चों को समझाने के लिए एक मौका मिल गया (मास्टर जी रह चुका हूँ) मैं बड़ी बेटी को गैर -परंपरागत ऊर्जा के स्त्रोतों के विषय में बताने लगा किन्तु बेटी की रूचि मेरी बात सुनने के बजाय बाहर देखने की ज्यादा थी. मैंने अपना भाषण बीच में ही रोक दिया तथा मैं भी बाहर ही देखने लगा. रास्ता काफी रोचक था तथा पता ही नहीं चला कि कब जैसलमेर आ गया. खैर हमने वहां से ऑटो किया तथा अपने होटल जैसल पैलेस पहुँच गए. होटल छोटा ही है पर पता नहीं क्यों नाम पैलेस रख दिया है. मैंने बुकिंग करते समय पत्नि को बताया था कि हमारी बुकिंग जैसल पैलेस होटल में है. तो वह भी काफी खुश बी कि चलो किसी बड़ी जगह में रुकेंगे, पर मुझे लगता है कि राजस्थान में अपने छोटे से मकान को भी लोक हवेली तथा महल कहते होंगे.
खैर दोपहर का खाना खाने का प्लान बनाया गया मैं किसी परंपरागत राजस्थानी होटल की तलाश कर रहा थे किन्तु काफी ढूँढने के उपरांत एक स्थान मिला वहां काफी भीड़ थी किन्तु बैठने की जगह मिल गयी. वेटर भाई से बात हुई तो वो भी उत्तराखंड का ही निकाल गया खैर उसने काफी तत्परता से हमें खाना खिलाया. फिट थोडा घुमने के बाद वापस होटल आ गए तथा दोपहर में आराम किया. शाम को फिर हम जैसलमेर के ही कुछ स्थान घूमने गए.











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