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Monday, May 26, 2014

तीसरा दिन : सम के बालू के टीले तथा रेगिस्तान के कैम्प में एक रात

        तीसरे दिन की सुबह ही हम जैसलमेर के किले की सैर को निकाल गए थे. किले का प्रवेश द्वारा से प्रवेश करते ही काफी रोचक नजारा देखने को मिला, बहुत सारे यात्री वापस आ रहे थे तथा किले के अन्दर प्रवेश कर रहे थे. किले के प्रवेश द्वार पर राजस्थानी परिधान पहने महिलाएं वहां की परंपरागत वस्तुएं, आभूषण, वस्त्र इत्यादि बेच रही थी पर उनके आकर्षण का केंद्र सिर्फ विदेशी यात्री ही लगे क्योंकि भारतीय यात्री इस मामले में काफी कंजूस होते हैं या फिर काफी मोल  भाव करने वाले, इसलिए ये लोग भी काफी चतुर हो गए हैं इसलिए विदेशी यात्रियों से ही बात चीत करना पसंद करते हैं. खैर  हमें तो कुछ लेना नहीं था अतः हम सीधे ही किले के अन्दर हो चले. किले के अन्दर पहुँच कर भी ऐसा ही लगता है कि मानों आप एक शहर में ही घूम रहे हैं, यदा कदा ऑटो रिक्शा यात्रियों को अन्दर ले जाते रहते हैं तथा किले के अन्दर रहने वाले लोग अपने निजी वाहनों से किले के अन्दर बाहर आते जाते रहते हैं. वाहनों के इस आवागमन से पैदल चलने वाले यात्रियों को काफी असुविधा का सामना करना पड़ता है. किले के अन्दर काफी मंदिर भी बने हैं तथा एक भवन जो कि शायद महल बताया गया था प्रवेश करने का शुल्क भी रखा गया था . खैर हम इधर उधर घूम कर किले के सबसे उच्च स्थान पर पहुंचे तथा वहां से जैसलमेर शहर का विहंगम दृश्य देखा तो मन प्रसन्न हो गया.

        किले के अन्दर रहने वाले लोगों के विषय में सोचता हूँ तो लगता है कि ये लोग भी कितने परेशान रहते होंगे कि इनके घरों में ताकते झांकते लोग, हमेशा लोगों की भीड़, खैर एक ऐतिहासिक ईमारत में रहने का कुछ तो नुकसान होगा ही. मैंने सुना है कि सरकार काफी प्रयास कर रही है कि इन लोगों को किले से बाहर निकाल कर कहीं बाहर बसा दिया जाय किन्तु ये लोग जाने को तैयार नहीं है. किले के अन्दर काफी सारे होटल तथा रेस्टोरेंट भी बने हुए हैं किन्तु ज्यादातर महंगे तथा विदेशी यात्रियों को आकर्षित करने हेतु विदेशी मेनू के साथ हैं. किला घुमने में काफी समय लग जाता है फिर हम किले से बाहर आए तथा अन्य हवेली देखने के लिए शहर रवाना हुए. दो बड़ी हवेलियाँ सलीम सिंह की हवेली तथा एक अन्य आमने सामने हैं, किन्तु हम अन्दर नहीं गए तथा बाहर से ही इनको देखा तथा सलीम सिंह की हवेली के सामने एक अन्य हवेली बनी हुई देखी  जो कि किसी की  निजी हवेली थी मैंने सोचा कि और 50-100 साल के बाद यह भी एक ऐतिहासिक हवेली होगी क्योंकि हुबहू वैसे ही बनी हुई थी.

         दोपहर करीब 4.00 बजे हम कार द्वारा सम के रेट के टीलों की और रवाना हुए. रस्ते में काफी प्राचीन जैन मंदिर भी देखा, टीलों पर पहुँचने से पहने ही हमारे ड्राईवर महोदय ने हमे कार से उतर जाने के लिए कहा कि अब आगे का सफ़र आप ऊँट से तय करेंगे. सामान आप कार में ही छोड़ सकते हैं तथा पानी की बोतल तथा कैमरा वगैरा लेकर हम ऊँट पर सवार हो गए एक ऊँट पर श्रीमती जी तथा बड़ी बेटी बैठी दूसरे  पर मैं और छोटी बेटी विराजमान हुए. ऊँट के मालिक  राजस्थानी नवयुवक थे जो कि काफी बातूनी थे तथा रस्ते भर हमें ऊँट से और आगे जाने का प्रलोभन देते रहे कि आपको असली रेगिस्तान देखने को मिलेगा, ऊँट की यात्रा ठीक ठाक रही (बचपन में में काफी बार अपने गाँव में भैंसे की सवारी कर चुका हूँ तो इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं हुई).

  ऊँट की सवारी के बाद हम काफी देर सूर्यास्त तक रेट में ही घूमते घंटे रहे- सूर्यास्त का दृश्य देखने की बाद ड्राईवर महोदय कार लेकर आ गए थी तथा थोड़ी सी दूर जाकर हमे एक कैम्प के द्वार पर छोड़ दिया. द्वारा पर पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा पहने कुछ महिलाओं ने हमारा स्वागत किया.

 


Friday, May 23, 2014

दूसरा दिन - बाड़मेर से जैसलमेर की बस यात्रा

बाड़मेर पहुँचाने के बाद हमने रेलवे स्टेशन के पास ही एक होटल में रात के लिया ए.सी. कमरा ले लिया था. होटल श्री कृष्णा, रात को तो सभी को काफी अच्छी नींद आई . अगले दिन सुबह ही नहा धोकर तैयार हुए तथा नाश्ता के लिए फिर अपने रात वाले होटल में ही चले गए, वहां हमने नाश्ते में परांठे खाए जो कि काफी स्वादिष्ट थे. हमने जैसलमेर जाने के लिए बस का पता किया पास ही मैं प्राइवेट बस स्टैंड बताया गया वाहन पहुंचे तथा पता किया कि बस कब जायेगी.









बस वाहन लगी हुई ही थी हमने अपना सामन रख दिया तथा खिड़की वाली सीट ले ली. बस भरने में समय लगता देख मेरी छोटी वाली बिटिया ने ड्राईवर साहब की सीट कब्ज़ा ली तथा ऐसे ही बस चलने का उपक्रम करने लगी. थोड़ी देर में बस से कुछ आवाज आई मैंने देखा तो बिटिया रानी ने चाबी घुमा दी थी ड्राईवर महोदय चाबी बस में लगी छोड़ गए थे. खैर बस में धीरे-धीरे यात्री आने शुरू हो गए थे, तभी मैंने एक सज्जन से बात करनी शुरू कर दी थी मेरी आदत है कि मैं सफ़र के दौरान लोगों से बात करने का प्रयास करता हूँ. बात चीत में पता लगा कि वह व्यक्ति उत्तराखंड से ही है तथा उस भाई की कहानी भी पूरी फ़िल्मी थी. वह बचपन में घर सी भाग आया था तथा काफी जगह काम करने के बाद किसी के साथ जैसलमेर आ गया था तथा अब पिछले 20 साल से जैलसमेर में ही रह रहा थे तथा यही शादी भी कर ले थी. उसको भी हमसे मिलकर अच्छा लगा. खैर साब बस शुरू हो गयी बस अच्छी थी तथा किराया भी काफी कम 150 कि.मी. की यात्रा के मात्र 100/- रु. प्रति व्यक्ति. और तो और बच्चों के कुछ भी नहीं लिया गया. यह काफी आश्चर्यजनक  था. रस्ते में बस एक स्थान पर रुकी हमने चाय तथा पकोड़ी खायी खाफी स्वादिष्ट थी. इसी बीच हमारे पास वाली सीट पर एक महिला अपने राजस्थानी परिधान में आकर बैठ गयी. घूँघट कर रखा था तथा पूरे रस्ते बेचारी इतनी गर्मी में भी मुंह ढक  कर बैठी रही.  रास्ते में एक तरफ तो थोड़ी बहुत हरियाली थी किन्तु दूसरी तरफ पूरी रेत  ही रेत. 


तभी बड़ी - बड़ी पवन चक्कियां भी दिखाई देनी शुरू हो गयी एक के बाद एक बहुत सारी बच्चे उन्हें देखकर बहुत खुश हुए तथा मुझे बच्चों को समझाने के लिए एक मौका मिल गया (मास्टर जी रह चुका हूँ) मैं बड़ी बेटी को गैर -परंपरागत ऊर्जा के स्त्रोतों के विषय में बताने लगा किन्तु बेटी की रूचि मेरी बात सुनने के बजाय  बाहर देखने की ज्यादा थी. मैंने अपना  भाषण बीच  में ही रोक दिया तथा मैं भी बाहर ही देखने लगा. रास्ता काफी रोचक था तथा पता ही नहीं चला कि कब जैसलमेर आ गया. खैर हमने वहां से ऑटो किया तथा अपने होटल जैसल पैलेस पहुँच गए. होटल छोटा ही है पर पता नहीं क्यों नाम पैलेस रख दिया है. मैंने बुकिंग करते समय पत्नि को बताया था कि हमारी बुकिंग जैसल पैलेस होटल में है. तो वह भी काफी खुश बी कि चलो किसी बड़ी जगह में रुकेंगे, पर मुझे लगता है कि राजस्थान में अपने छोटे से मकान को भी लोक हवेली तथा महल कहते होंगे. 

खैर दोपहर का खाना खाने का प्लान बनाया गया मैं किसी परंपरागत राजस्थानी होटल की तलाश कर रहा थे किन्तु काफी ढूँढने के उपरांत एक स्थान मिला वहां काफी भीड़ थी किन्तु बैठने की जगह मिल गयी. वेटर भाई से बात हुई तो वो भी उत्तराखंड का ही निकाल गया खैर उसने काफी तत्परता से हमें खाना खिलाया. फिट थोडा घुमने के बाद वापस होटल आ गए तथा दोपहर में आराम किया. शाम को फिर हम जैसलमेर के ही कुछ स्थान घूमने गए.  


Thursday, May 22, 2014

जैसलमेर तथा बाड़मेर की यात्रा

हमारी जैसलमेर यात्रा

बहुत दिनों से सोच रहे थे कि कही घूम कर आया जाए. ऐसा अवसर ही प्राप्त नहीं हो पा रहा था. कारण आर्थिक भी थे तथा सामाजिक भी. आर्थिक समस्या जब सुलझी तो सोचा कि अब और नहीं अब टी कहीं न कहीं  जाना ही है, क्योंकि मैं इधर देख रहा था कि नौसेना की नौकरी छोड़ने के बाद एवं रूडकी रहना शुरू करने के बाद कहीं जाया ही नहीं गया था तथा इसलिए लम्बे सफ़र से डर सा भी लगने लगा था . मैंने इस यात्रा के लिए अक्टूबर के महीने का चुनाव इसलिए किये कि सफ़र में ज्यादा गर्म कपडे भी नहीं रखने पड़ेंगे, क्योंकि भाई मध्यम वर्गीय परिवार बिन तथा बन्दे की पूरी आस्था समाजवाद में है इसलिए समाजवादी विचार पर आस्था रखते हुए स्लीपर श्रेणी में ही जाने का प्लान बनाया. 


जब बच्चो को पता चला तो वे भी बड़े खुश हुए कि चलो स्लीपर क्लास की कम से कम खिड़कियाँ खुल तो जाती हैं, और बस या रेल के सफ़र का मजा ही जब आता है जब आपको सीट खिड़की की मिल जाए. मुझे याद आता है नौसेना की नौकरी के दौरान जब एक बार मुझे उडुपी से दिल्ली तक राजधानी एक्सप्रेस गाडी में ए.सी. 3 स्लीपर में यात्रा का अवसर (मुफ्त में) प्राप्त हुआ था तो बड़ी बेटी उस समय 02 वर्ष की थी गाडी में बैठते ही फटाफट खिड़की पर पहुंची तथा अपनी तोतली आवाज में बोली पापा जल्दी से डिंग-डोंग खोल दो (विंडो को वह ऐसा कह कर बोल रही थी). अब मेरे सामने यक्ष प्रश्न कि इस बच्ची को कैसे बताया जाए कि बेटा यह महँगी वाली ट्रेन है तथा इसमें ऐसे ही  बैठ कर जाया जाता है . बेटी बड़ी नाराज हुई बोली यह तो ख़राब ट्रेन है इसमें क्यों बैठे, मैं उसी दिन समझ गया था कि बच्ची में अपने पापा के समाजवादी विचारों का  समावेश हो चुका है. 
खैर साब अब बात इस सफ़र  की करते हैं, हमारा आरक्षण रात की गाडी में था जो हरिद्वार से चलती है तथा सीधे बाड़मेर तक जाती है. धर्मपत्नी ने जाने की सारी  तैयारी कर ली थी (सबसे बड़ी तैयारी सफ़र के दौरान खाने पीने की व्यवस्था करने की होती है) तथा इस कार्य में हमारी लेडीज एकदम एक्सपर्ट होती हैं पूरी, आलू वगैरा बन गए तथा बच्चों के लिए भी काफी मात्रा में चिप्स आदि सामन रख लिया गया था. बच्चों में ऐसा देख जाता है कि चाहे हमारा सफ़र बस या ट्रेनमें थोड़े से ही समय का क्यों न हो बैठते ही उन्हें अचानक भूख लग ही जाती है तो इस संभावना पर विचार हमारी श्रीमति जी ने पहले से ही कर लिया था तथा उनकी उदरपूर्ति की सारे साधन जमा कर लिए गए थे.
अगली सुबह गाडी राजस्थान राज्य में प्रवेश कर चुकी थी. अब ट्रेन की खिड़की से बाहर का नजारा बदलने लगा था दूर दूर तक खाली जमीन जो कि अपने इलाके में असंभव बात है (जनसँख्या घनत्व अधिक होने की कारण) . रास्ते मैं बीकानेर व नागौर जैसे कुछ बड़े स्टेशन पड़े खैर रात करीब आठ बजे हमारी ट्रेन बाड़मेर पहुँच गयी. स्टेशन के पास ही के होटल में कमरे का इंतजाम हो जाने के उपरांत खाने की लिए निकले . 

इस मुद्दे पर भी मेरी समाजवादी विचारधारा तथा बन्दे का पहले से किये गए कई बार के ऐसी यात्राओं का  अनुभव काम आया बन्दे ने स्टेशन सी बाहर निकलते ही एक ढाबा नुमा होटल देख लिया था, खैर उस स्थान का खाना हमें काफी पसंद आया, एक सब्जी तथा एक दाल का आर्डर दिया गया. बड़ी बेटी भले ही सफ़र के मामले में समाजवादी है पर खान -पान पर वह बाजारवादी ताकतों का शिकार हो चुकी है परिणामस्वरूप उसने खाना खाने में शुरुआत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, परन्तु हम सबको खाना न्जोय करते देख उसने भी खाना शुरू किया तो उसे भी खाना पसंद आया. खाना खा चुकने की बाद थोड़ी आईस क्रीम खाई गयी तथा फिर वापस आकर आराम किया क्योंकि अगले सुबह हमें बस द्वारा जैसलमेर के लिए निकलना था.