तीसरे दिन की सुबह ही हम जैसलमेर के किले की सैर को निकाल गए थे. किले का प्रवेश द्वारा से प्रवेश करते ही काफी रोचक नजारा देखने को मिला, बहुत सारे यात्री वापस आ रहे थे तथा किले के अन्दर प्रवेश कर रहे थे. किले के प्रवेश द्वार पर राजस्थानी परिधान पहने महिलाएं वहां की परंपरागत वस्तुएं, आभूषण, वस्त्र इत्यादि बेच रही थी पर उनके आकर्षण का केंद्र सिर्फ विदेशी यात्री ही लगे क्योंकि भारतीय यात्री इस मामले में काफी कंजूस होते हैं या फिर काफी मोल भाव करने वाले, इसलिए ये लोग भी काफी चतुर हो गए हैं इसलिए विदेशी यात्रियों से ही बात चीत करना पसंद करते हैं. खैर हमें तो कुछ लेना नहीं था अतः हम सीधे ही किले के अन्दर हो चले. किले के अन्दर पहुँच कर भी ऐसा ही लगता है कि मानों आप एक शहर में ही घूम रहे हैं, यदा कदा ऑटो रिक्शा यात्रियों को अन्दर ले जाते रहते हैं तथा किले के अन्दर रहने वाले लोग अपने निजी वाहनों से किले के अन्दर बाहर आते जाते रहते हैं. वाहनों के इस आवागमन से पैदल चलने वाले यात्रियों को काफी असुविधा का सामना करना पड़ता है. किले के अन्दर काफी मंदिर भी बने हैं तथा एक भवन जो कि शायद महल बताया गया था प्रवेश करने का शुल्क भी रखा गया था . खैर हम इधर उधर घूम कर किले के सबसे उच्च स्थान पर पहुंचे तथा वहां से जैसलमेर शहर का विहंगम दृश्य देखा तो मन प्रसन्न हो गया.
किले के अन्दर रहने वाले लोगों के विषय में सोचता हूँ तो लगता है कि ये लोग भी कितने परेशान रहते होंगे कि इनके घरों में ताकते झांकते लोग, हमेशा लोगों की भीड़, खैर एक ऐतिहासिक ईमारत में रहने का कुछ तो नुकसान होगा ही. मैंने सुना है कि सरकार काफी प्रयास कर रही है कि इन लोगों को किले से बाहर निकाल कर कहीं बाहर बसा दिया जाय किन्तु ये लोग जाने को तैयार नहीं है. किले के अन्दर काफी सारे होटल तथा रेस्टोरेंट भी बने हुए हैं किन्तु ज्यादातर महंगे तथा विदेशी यात्रियों को आकर्षित करने हेतु विदेशी मेनू के साथ हैं. किला घुमने में काफी समय लग जाता है फिर हम किले से बाहर आए तथा अन्य हवेली देखने के लिए शहर रवाना हुए. दो बड़ी हवेलियाँ सलीम सिंह की हवेली तथा एक अन्य आमने सामने हैं, किन्तु हम अन्दर नहीं गए तथा बाहर से ही इनको देखा तथा सलीम सिंह की हवेली के सामने एक अन्य हवेली बनी हुई देखी जो कि किसी की निजी हवेली थी मैंने सोचा कि और 50-100 साल के बाद यह भी एक ऐतिहासिक हवेली होगी क्योंकि हुबहू वैसे ही बनी हुई थी.
दोपहर करीब 4.00 बजे हम कार द्वारा सम के रेट के टीलों की और रवाना हुए. रस्ते में काफी प्राचीन जैन मंदिर भी देखा, टीलों पर पहुँचने से पहने ही हमारे ड्राईवर महोदय ने हमे कार से उतर जाने के लिए कहा कि अब आगे का सफ़र आप ऊँट से तय करेंगे. सामान आप कार में ही छोड़ सकते हैं तथा पानी की बोतल तथा कैमरा वगैरा लेकर हम ऊँट पर सवार हो गए एक ऊँट पर श्रीमती जी तथा बड़ी बेटी बैठी दूसरे पर मैं और छोटी बेटी विराजमान हुए. ऊँट के मालिक राजस्थानी नवयुवक थे जो कि काफी बातूनी थे तथा रस्ते भर हमें ऊँट से और आगे जाने का प्रलोभन देते रहे कि आपको असली रेगिस्तान देखने को मिलेगा, ऊँट की यात्रा ठीक ठाक रही (बचपन में में काफी बार अपने गाँव में भैंसे की सवारी कर चुका हूँ तो इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं हुई).
ऊँट की सवारी के बाद हम काफी देर सूर्यास्त तक रेट में ही घूमते घंटे रहे- सूर्यास्त का दृश्य देखने की बाद ड्राईवर महोदय कार लेकर आ गए थी तथा थोड़ी सी दूर जाकर हमे एक कैम्प के द्वार पर छोड़ दिया. द्वारा पर पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा पहने कुछ महिलाओं ने हमारा स्वागत किया.
किले के अन्दर रहने वाले लोगों के विषय में सोचता हूँ तो लगता है कि ये लोग भी कितने परेशान रहते होंगे कि इनके घरों में ताकते झांकते लोग, हमेशा लोगों की भीड़, खैर एक ऐतिहासिक ईमारत में रहने का कुछ तो नुकसान होगा ही. मैंने सुना है कि सरकार काफी प्रयास कर रही है कि इन लोगों को किले से बाहर निकाल कर कहीं बाहर बसा दिया जाय किन्तु ये लोग जाने को तैयार नहीं है. किले के अन्दर काफी सारे होटल तथा रेस्टोरेंट भी बने हुए हैं किन्तु ज्यादातर महंगे तथा विदेशी यात्रियों को आकर्षित करने हेतु विदेशी मेनू के साथ हैं. किला घुमने में काफी समय लग जाता है फिर हम किले से बाहर आए तथा अन्य हवेली देखने के लिए शहर रवाना हुए. दो बड़ी हवेलियाँ सलीम सिंह की हवेली तथा एक अन्य आमने सामने हैं, किन्तु हम अन्दर नहीं गए तथा बाहर से ही इनको देखा तथा सलीम सिंह की हवेली के सामने एक अन्य हवेली बनी हुई देखी जो कि किसी की निजी हवेली थी मैंने सोचा कि और 50-100 साल के बाद यह भी एक ऐतिहासिक हवेली होगी क्योंकि हुबहू वैसे ही बनी हुई थी.
दोपहर करीब 4.00 बजे हम कार द्वारा सम के रेट के टीलों की और रवाना हुए. रस्ते में काफी प्राचीन जैन मंदिर भी देखा, टीलों पर पहुँचने से पहने ही हमारे ड्राईवर महोदय ने हमे कार से उतर जाने के लिए कहा कि अब आगे का सफ़र आप ऊँट से तय करेंगे. सामान आप कार में ही छोड़ सकते हैं तथा पानी की बोतल तथा कैमरा वगैरा लेकर हम ऊँट पर सवार हो गए एक ऊँट पर श्रीमती जी तथा बड़ी बेटी बैठी दूसरे पर मैं और छोटी बेटी विराजमान हुए. ऊँट के मालिक राजस्थानी नवयुवक थे जो कि काफी बातूनी थे तथा रस्ते भर हमें ऊँट से और आगे जाने का प्रलोभन देते रहे कि आपको असली रेगिस्तान देखने को मिलेगा, ऊँट की यात्रा ठीक ठाक रही (बचपन में में काफी बार अपने गाँव में भैंसे की सवारी कर चुका हूँ तो इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं हुई).
ऊँट की सवारी के बाद हम काफी देर सूर्यास्त तक रेट में ही घूमते घंटे रहे- सूर्यास्त का दृश्य देखने की बाद ड्राईवर महोदय कार लेकर आ गए थी तथा थोड़ी सी दूर जाकर हमे एक कैम्प के द्वार पर छोड़ दिया. द्वारा पर पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा पहने कुछ महिलाओं ने हमारा स्वागत किया.
















