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Sunday, October 30, 2016

पहली हवाई यात्रा :: गोआ की सैर








काफी समय से हवाई यात्रा की इच्छा हो रही थी । फिर इधर जबसे इस क्षेत्र में भी निजी विमानन कंपनियों का आना हुआ है तो किराये में भी काफी कमी आई है तथा जो मधमवर्गीय मेरे जैसे व्यक्ति थे तथा सुपरफास्ट ट्रेन के स्लीपर क्लास में यात्रा करने को ही परम सौभाग्य मानकर खुश हो जाते अब हवाई यात्रा के विषय में सोच सकते थे । किराया मालूम किया । फिर समय का अंदाज लगाया गया कि सफ़र इतना लंबा तो हो कि लगे कि बैठे हैं और थोडा बहुत कुछ खाया पिया भी । वरना आजकल देहरादून से दिल्ली की भी हवाई यात्रा शुरू कर दी गयी है । परंतु उसमे तो यात्री सीट बेल्ट को खोलते ही नहीं होंगे । खैर टिकट बुकिंग इत्यादि होने के उपरांत यात्रा दिवस की बेसब्री से इंतज़ार होने लगी । बच्चे भी काफी रोमांचित थे । खैर यात्रा की तिथि को हम ससमय ही हवाई अड्डे पर पहुँच गए थे क्योंकि अनुभवी लोगो से मिले मार्गदर्शन के अनुसार जांच इत्यादि की प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है । जांच की प्रक्रिया पूरी होने के उपरांत भी लगभग एक घंटे का समय हमारे पास था । तो आदतन सोचा कि तब तक हवाई अड्डे में ही घुमा फिरा जाए ।



 दिल्ली हवाई अड्डे के अंदर भी काफी दुकानें थी । खाने पीने का भी काफी सामान मिल रहा था । भारतीय बच्चे  इस मामले में काफी चतुर होते हैं । घर पर इनको कुछ खिलाओ तो नहीं खाएंगे पर बाहर जाते ही उनको खुल कर भूख लग जाती है । खाने पीने के विभाग का जिम्मा श्रीमती जी को ही दे रखा था । उन्होंने भी पूछा कि बच्चे कुछ खाने की जिद कर रहे हैं । क्या करना ह ? मैंने कहा कि समझा दो कि हमने हवाई जहाज में भी खाने पीने का सामान बुक कर रखा है वहीँ देख लेंगे । पर बच्चे कहाँ मानते हैं प्रायः देखा गया है कि ऐसे अवसरों पर उनकी भूख अक्सर बढ़ जाया करती है जहाँ पर खाने पीने का सामान काफी महंगा होता है । खैर सोचा गया कि ऐसी कोई चीज ले ली जाय जिसको पहले भी खा चुके हों वरना वहां ज्यादातर सामान ऐसे थे जिनके नाम भी मेरे लिए अजनबी थे । आमतौर पर लगभग हर मुद्दे पर अलग राय रखने वाले परिवारी जान एक मुद्दे पर मेरी राय पर सहमत हो जाते हैं । दक्षिण भारतीय व्यंजन खाने के मामले में । विरोध होने की गुंजाइश न देखते हुए साउथ थाली ही माँगा ली गयी जिसको सभी ने बड़े चाव से खाया । 

खैर कुछ समय के बाद हमारी उड़ान हेतु यात्रियों को भेजे जाने की udghoshna हुई । हम तत्काल लाइन में लग गए और अपनी बारी का बड़ी ही व्यग्रता से इंतज़ार करने लगे । आने वाली उड़ान में कुछ समय लग रहा था इस कारण से यात्रियों को भेजा नहीं जा रहा था । इस कारण एक सज्जन आग बबूला हो बैठे और ग्राउंड ड्यूटी करने वाले एक नवयुवक को बुरा भला कहने लगे । युवक उनको हो रही देरी का कारण बड़े ही धैर्य से समझने की कोशिश करता रहा । खैर थोड़ी ही इंतज़ार के उपरांत रास्ता खोल दिया गया और हवाई जहाज तक हमको ले जाने हेतु इंडिगो वालो की ही बस लगा दी गयी । बस में सवार होकर हवाई जहाज के पास पहुंचे । अब हम सबकी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी हवाई जहाज को पास से देखने की तथा उसमे सवार होने की । परंतु उससे पहले इन पलों को कैमरे में कैद भी कर लिया गया ।



 कुछ फ्रीक्वेंट ट्रैवलर हमारे अति उत्साह को देख कर समझ गए तथा हमे फ़ोटो इत्यादि खींचने देने हेतु खुद ही साइड में हो गए । खैर विमान में पदार्पण हुआ हवाई परिचारिका से दुआ सलाम हुई और हम अपनी अपनी सीट पर बैठ गए । छोटी बेटी मेरे पास बैठी और बड़ी अपनी मम्मी के पास । हमने दो सीट खिड़की वाली ली थी ताकि बाहर का नजारा दिखाई दे सके । खैर बैठने के उपरांत भी थोड़े और फ़ोटो खींचे गए । तभी विमान के दरवाजे बंद होने का संकेत मिला और कहा गया कि विमान उड़ान भरने के लिए तैयार है । विमान ने पहले धीमी गति में फिर तीव्र गति से दौड़ना शुरू किया तथा भूमि छोड़ दी और हवा में उड़ना शुरू कर दिया ।





 मै खिड़की से बाहर का नजारा देखने में व्यस्त हो गया और इन पलों को भी कैमरा में कैद करने लगा । कुछ ऊँचाई तक तो दिल्ली की ऊंची ऊंची इमारतें दिखाई देती रही किन्तु फिर और अधिक ऊँचाई पर जाने के बाद भूमि के ऊपर बादलों का एक आवरण सा छा गया जिसके कारण नीचे का कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया । विमान की उड़ान से पहले चालक दल द्वारा अपना तथा केबिन क्रू का परिचय दिया गया इसके साथ साथ ही विमान परिचारिका ने बहुत ही अनूठे अंदाज में किसी भी आपात स्थिति में विमान से निकलने के तरीके तथा अपनी अपनी सीट बेल्ट बांधे जाने की हिदायत दी । लड़ने वाले सज्जन को परिचारिका महोदया द्वारा बार बार टोका गया तब कहीं जाकर उन्होंने अपनी सीट बेल्ट बाँधी । विमान अब दिल्ली के ऊपर पहुँच गया था तथा अब नीचे कि सभी चीजें छोटी छोटी दिखाई देनी शुरू हो गयी थी. 

थोड़ी देर के उपरांत विमान परिचारिकाओं ने खाने पीने कि ट्राली विमान के बीच में घुमानी शुरू कर दी थी. वैसे तो रास्ता ज्यादा लम्बा नहीं था किन्तु ट्रेन के सफ़र के अनुभव को देखते हुए मुझे लगा कि अपने पास खाने पीने का कुछ न कुछ सामान जरुर होना चाहिए, क्योंकि बच्चों को सफ़र में कुछ न कुछ खाना जरुर अच्छा लगता है. हमने शाकाहारी सैंडविच, एक शीतल पेय और मैंने अपने लिए काफी लेना पसंद किया. परिचारिकाओं से सभी को खाद्य पदार्थ दिए और अपना कार्य समाप्त कर लिया. अब विमान मुंबई लैंड करने वाला ही था. मुंबई को मैं 2005 में छोड़ चुका था, और अब काफी कुतूहल मुझे भी था कि ऊपर से मुंबई कैसा दिखाई देता होगा. मैं मुंबई के कुछ लैंड मार्क्स तलाश करने लगा और मुझे दिखाई दिया वरली, वाला सी लिंक जिसे मेरे आने के बाद बनाया गया था. मुझे उम्मीद थी कि गेट वे ऑफ़ इंडिया और अपना कोलाबा एरिया भी दिखाई देगा परन्तु तभी विमान कि लैंडिंग हो गयी. कुछ यात्री नीचे उतरे और करीब आधा घंटा ठहरने के बाद विमान फिर से उड़ान भरने के लिए तैयार हुआ. इसी बीच मैं मुंबई कि हवा में ११ साल फिर से सांस लेने के लिए विमान के गेट तक आया, मुंबई को वही चिर परिचित हवा कि गंध, जिसमे समुद्र कि नमी और मछलियों कि गंध मिली होती है. तभी विमान परिचारिका ने मुझे अपनी सीट पर बैठ जाने कि हिदायत दे डाली. मैं वापस आ गया. विमान ने गोवा के लिए उड़ान भरी, अब यात्रियों में कुछ पर्यटक और कुछ युवा जो शायद गोवा के ही निवासी थे शामिल हुए. करीब 40 मिनट कि उड़ान के बाद विमान गोवा के ऊपर  पहुँच गया, गोवा में मैंने नौसेना के दिनों की शुरुआत में 03 साल साल 1991 से 1994 गुजारे थे. मैं बहुत उत्सुक था कि क्या विमान से नीचे कि कोई जगह मैं पहचान सकता हु, मुझे कुछ परिचित से लैंड मार्क दिखाई दिए. इसी बीच विमान ने वास्को डी गामा हवाई अड्डे पर लैंडिंग कर दी. हवाई अड्डे पर काफी परिवर्तन दिखाई दिया, गोवा में जब मैं था तब एअरपोर्ट उतना बड़ा नहीं था, किन्तु अब तो सभी कुछ बदल चुका था. मुझे इतने सालों बाद गोवा फिर से आना वाकई काफी अच्छा सा लग रहा था. बाहर आते ही आसपास नजर डाली काफी परिवर्तन आ गया था. अब तक गोवा ट्रेन से ही आने का अनुभव था. उन दिनों गोवा एक्सप्रेस निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से 12.25 पर चल कर तीसरे दिन सुबह सुबह 6.00 बजे वास्को स्टेशन पहुँच जाती थी. कहाँ वह तीन दिनों का सफ़र और कहाँ यह कुछ चाँद घंटो का ही सफ़र, काफी अलग सा अनुभव लगा. कुछ ही घंटो में मौसम और स्थान में इतना बड़ा परिवर्तन देखना काफी अलग सा लगा. ट्रेन में सब कुछ धीरे धीरे बदलता था. दिल्ली से चलकर शाम तक ग्वालियर आते आते कुछ परिवर्तन दीखते थे. अगली सुबह ट्रेन मध्य प्रदेश से होकर महाराष्ट्र में प्रवेश कर जाती थी तो लोगों कि वेशभूषा, बाहर के दृश्य में काफी अंतर दिखाई पड़ता था. दोपहर के समय ट्रेन पुणे पहुँच जाती थी और दिन ढलते ढलते सातारा के घाट से गुजरती थी. रात 8.०० बजे मिरज स्टेशन पर पहुँच कर ब्रॉड गेज कि ट्रेन छोड़ कर मीटर गेज के ट्रेन में सवार होते थे. उन दिनों मिरज रेलवे स्टेशन पर ब्रेड ऑमलेट मिला करता था. वही मेरा डिनर होता था क्योंकि घर से लाया हुआ भोजन तब तक कि यात्रा में समाप्त हो जाया करता थे. पूरी रात के सफ़र के बाद ट्रेन सुबह सुबह वास्को पहुँचती थी. खैर ट्रेन के सफ़र का अपना एक अलग ही आनंद है जो कि हवाई यात्रा में कभी भी नहीं आ सकता. पर इसका भी अनुभव जरुरी था. अपनी विचार तन्द्रा को भंग करते हुए   तभी एक टैक्सी वाले भाई से बात कि और अपने गंतव्य कि और रवाना हुए जो कि गोवा के प्रसिद्ध बीच कोलान्गुते के पास था. 

  

होटल पहुँच कर थोडा विश्राम करने के बाद बच्चे बीच पर जाने कि जिद करने लगे. बीच पर उस समय भी काफी संख्या में पर्यटक मौजूद थे. चूँकि मानसून का समय शुरू हो चुका था तो समुद्र अपने रौद्र रूप में आ चुका था और बीच पर तैनात लाइफ गार्ड्स समय समय पर लोगों को ज्यादा अन्दर न जाने कि चेतावनी दे रहे थे. 


इसी बीच छोटी बेटी ने मौका पाकर बालू में खेलना शुरू भी कर दिया और बड़े ही मनोयोग से कुछ बनाने लगी. गोवा में 04 दिन गुजार लेने के बाद वापसी भी विमान से की गयी. इस बार उड़ान रात कि थी. मैंने सोचा कि दिन और रात दोनों के समय के सफ़र का अनुभव किया जाय. 


इस प्रकार हमारी पहली हवाई यात्रा सकुशल संपन्न हुई. इस यात्रा से काफी कुछ सीखने को भी मिला और बच्चों को भी. अब वो बड़े होने के बाद जरुरत पड़ने पर अकेले ही हवाई यात्रा कर पायेंगे यही मुझे लगा. 

यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की यात्रा 08 से 12 अक्टूबर 2016 के बीच

इधर मुझे चकराता आये हुए डेढ़ वर्ष बीत चुका था . जौनसार के काफी स्थानों के यात्रा कर लेने के बाद मन में आया कि यहाँ से चूँकि यमुनोत्री धाम नजदीक पड़ता हा अतः चकराता से जाने से पूर्व श्री यमुनोत्री धाम कि यात्रा कर ली जाय. कई बार सोचा और धर्मपत्नी को भी बता दिया था कि कभी भी मौका मिलने पर मै यमुनोत्री धाम कि यात्रा पर जाऊँगा. खैर मुझे ऐसा सुअवसर मिल ही गया या यु कहिये कि इश्वर कि कृपा हुई और 08 अक्टूबर को पड़ रहे दुसरे शनिवार, 09 वाले रविवार को मैंने यमुनोत्री धाम जाने का मन पक्का किया. साथ में कोई चलने को तैयार नहीं मिला तो मै अकेले ही चल दिया. चकराता से ०७ अक्टूबर को शाम को चलकर अपने एक परिचित श्री राना जी के यहाँ रात्रि विश्राम करने के बाद उन्ही से रास्ता इत्यादि पुछा और 08 अक्टूबर कि सुबह 5.३० बजे विकास नगर से मोरी, सांकरी जाने वाली बस में सवार हो गया . मुझे नौगाँव जाकर इस बस को छोड़ देना था और फोर वहां से बडकोट के लिए दूसरा साधन लेना था. मै सुबह के साढ़े दस बजे बडकोट पहुँच गया था / तथा अभी करीब ५५ किलोमीटर का सड़क मार्ग और आगे 05 किलोमीटर का पैदल मार्ग भी बाकी बच रहा था . सोच रहा था कि यदि दिन में ही दर्शन हो गए तो शाम तक बडकोट वापस आ जाऊँगा. परन्तु बडकोट से आगे जानकी चट्टी तक जाने का कोई भी साधन नहीं मिल रहा था. मुझे बताया गया कि चूँकि यात्रा सीजन अब ख़त्म हो गया है अतः बहुत ही कम सवारी उस रूट कि मिल पाती हैं और गाडी सिर्फ बुकिंग पर ही जा रही हैं. खैर करीब 12.३० मुझे एक बोलेरो मिली पायी जिसमे ज्यादातर पढने वाले बच्चे सवार थे जो दशहरे कि छुट्टियों में अपने गाँव में जा रहे थे . करीब 2.०० मै जानकी चट्टी पहुँच गया .

अब आगे पैदल मार्ग शुरू हो रहा था . तो मैंने थोडा आराम किया और एक दूकान पर चाय पी, अपनी पानी की बोतल भर ली और यमुना माँ को स्मरण कर अपनी पैदल यात्रा शुरू कर दी . मुझे अचरज हुआ कि उस समय मुझे धाम कि और जाने वाला कोई और यात्री नहीं मिला, बल्कि सभी लोग दर्शन करने के बाद वापस आते हुए दिखाई दिए. शायद ये सभी लोग सुबह ही अपनी पैदल यात्रा कि शुरुआत कर चुके थे. खैर मै मार्ग के मनोहारी दृश्यों को निहारता हुआ, और समय समय पर रुक रुक कर फोटो खींचता हुआ धाम की और चलने लगा. मार्ग काफी अच्छा बना दिया गया है जिस पर खच्चर भी चलते हैं. रास्ते में दर्शन करने के बाद काफी लोग पैदल, खच्चर पर, डंडी में और डोलियों पर भी बैठ कर वापस आ रहे थे. 

मैंने हिसाब लगाया कि पांच किलोमीटर की यात्रा करीब 02 घंटे में पूरी हो जानी चाहिए यानी कि 4.०० बजे तक मैं धाम पहुँच जाऊँगा, फिर जल्दी से दर्शन करने के बाद 6 या 7 बजे तक जानकी चट्टी वापस पहुँच ही जाऊँगा. परन्तु मुझे क्या पता था कि माँ यमुना के धाम में मुझे एक रात गुजारने का मौका मिलने वाला है. रास्ते में रुकते हुए फोटो वगैरा लेते हुए मैं करीब 4.३० बजे ही धाम पहुँच पाया. 

धाम पर उस समय काफी कम श्रीधालू ही बच रहे थे / मैंने जल्दी से प्रसाद ख़रीदा और मंदिर कि और बढ़ गया. वहां जाते ही दर्शन किये प्रसाद लिया और पास ही बह रही माँ यमुना जी कि धार के पास जल लेने के लिए पहुँच गया. धरा अपने पुरे वेग के साथ कल कल करती बह रही थी . उस दृश्य को देखते ही मन में कुछ दुःख सा भी हुआ कि ये देवी स्वरुप जीवन दायिनी नदियाँ इतने सारे लोगों का जीवन पाल रही हैं और हम इनके साथ कितना बुरा बर्ताव करते हैं जब ये नीचे बड़े बड़े शहरों के पास से गुजरती हैं. मुझे लगा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी भी नदी के उद्गम स्थल पर जरुर आना चाहिए, क्योंकि उद्गम स्थल पर आकर वाकई लगता है कि हमें इनकी हर हाल में रक्षा करनी चाहिए. हमारे देश को तो इश्वर और प्रकृति का या अद्भुत वरदान प्राप्त है कि प्रकृति ने हमें सभी संभाव्य चीजें प्रदान कि हैं लेकिन बड़ा दुःख होता है यह देख कर कि हम इस उपहार कि सही कीमत नहीं पहचान रहे. 


जल लेने के बाद और यमुना माँ को प्रणाम करने के बाद मैं वापस मंदिर के पास आया और वापस जाने कि तैयारी के बारे में सोचने ही लगा , तभी मुझे वहां से गुजरते हुए कुछ लोग एक कुंद में स्नान करते दिखाई दिए, वह गर्म पानी ओया प्राकृतिक स्त्रोत था. मुझे लगा कि मुझे भी कम से कम थोड़े पैर तो भिगो लेने चाहिए, किन्तु उस ठण्ड में और थकान के कारण नहाने का ही मन कर आया. मेरे पास कपडे तो थे ही  अतः मै झटपट पानी में उतर ही गया. शुरू में तो पानी बहुत गर्म सा लगा किन्तु जब एक दो दुबकी लगे तो फिर उस गर्म जल से बाहर निकलने का मन ही नहीं कर रहा था. इसी बीच कुंड में स्नान करने आर्मी वालों का भी एक दल आ पहुंचा. एक विदेशी जोड़ा भी बड़े ही कोतुहल से हम सबको गर्म पानी में स्नान करता देख रहा था. मैंने उनसे बात कि तो पता चला कि दोनों इस्रायल से आये हुए पर्यटक हैं. मैंने उनको बताया कि लेडीज के लिए अलग से व्यवस्था है और पुरुष हमारे साथ ही आकर स्नान कर सकते हैं. यह सुनकर वह बहुत खुश हुआ और फी काफी देर तक हमारे साथ ही स्नान करने लगा. बातचीत के दौरान पता चला कि पुरुष को तो कल ही स्वदेश वापस जाना है किन्तु उसकी महिला मित्र अभी कुछ दिन और भारत में रुकेगी. उन दोनों को भारत के विषय में काफी साड़ी जानकारी थी, थोडा बहुत मैंने भी उनको बताया, किन्तु मुझे लगा कि हम भारतीय कितना कम दुसरे देशों, और उनकी संस्कृति के विषय में जानते हैं. मुझे भी उनके धर्म और देश के विषय में अपने अल्प ज्ञान पर काफी बुरा सा लगा. बात ही बात में मैंने उनको कौरव, पांडव और महाभारत और अभिमन्यु कि कथा के विषय में भी बताया. स्नान करने के बाद बहार आकर मैंने ही उसको अपना तोलिया दिया जिससे कि वो भाई अपने कपडे बदल पाया. बाद में वो दोनों मेरे साथ के फोटो के लिए भी तैयार हुए. 


इसी बीच दिन भी अपनी समाप्ति के और था और अन्धकार भी हो चला था. अब मेरा मन वहीँ रात्रि विश्राम के लिए रुकने के लिए कर उठा. मैंने रुकने के लिए कमरे कि तलाश की तो यमुना आश्रम में एक कमरा ले लिया. यात्री तो ज्यादा रुके हुए नहीं थे. कमरा अच्छा था, वहीँ खाने का भी प्रबंध था. खाना खाने के दौरान हुई बातचीत में वहां काम कर रहे लोगों ने बताया कि १५ अक्टूबर तक वो सभी लोग वहां से अगले 6 महीनो के लिए चले जायेंगे. खैर खाना खाकर मैं जल्दी से अपने बिस्तर पर ही पहुँच गया, और लेटते ही थकान और ठण्ड के कारण नींद आ गयी. अगले दिन सुबह उठकर फिर गर्म पानी के कुंद में स्नान करने के बाद पुनः एक बार और दर्शन किया और वापसी का रास्ता पकड़ लिया. रस्ते में काफी सारे लोग दर्शनों के लिए आते दिखाई दिए. कुछ काफी बुज़ुर्ग लोग पैदल ही अपने गंतव्य के और बढ़ रहे थे. उनकी हिम्मत और श्रधा देख कर मेरा मन भी उनकी जिजीविषा के लिए नतमस्तक हो उठा. 



इस प्रकार मेरी यमुनोत्री धाम कि यात्रा पूर्ण हुई. मैं करीब 2 बजे वापस बडकोट आ गया था. अभी छुट्टी के दो दिन और शेष थे तभी मन में आया कि क्यों न लगे हाथ गंगोत्री धाम कि भी यात्रा कर लूँ. अब वहां से मुझे उत्तरकाशी पहुंचना था जो कि करीब १२० किलीमीटर कि दुरी पर था. मुझे लगा कि शाम तक भी यदि उत्तरकाशी पहुँच गया तो फिर आगे जाने का भी कोई न कोई बंदोबस्त हो ही जाएगा.  लेकिन उत्तरकाशी आने के बाद गंगोत्री धाम की तरफ जाने के लिए कोई भी साधन नहीं मिल रहा था. एक बोलेरो वाला bhatwadi  तक लोकल सवारी लेकर जाने को तैयार था. मैंने सोचा कि चलो bhatwadi तक ही चल देता हु कुछ तो सफ़र कम होगा. फिर वहां पहुँच कर देखा जाएगा. मै सोच रहा था कि यदि रात तक भी गंगोत्री धाम पहुँच गया तो दर्शन करने के बाद एक रात वहां भी रुक जाऊँगा. खैर करीब 6 बजे शाम को bhatwadi पहुँच गया था. अभी गंगोत्री धाम कि दुरी करीब ८० किलोमीटर शेष थी. मैं एक कप चाय पीकर सड़क के किनारे किसी गाडी की वेट  में खड़ा हो गया. किन्तु 7 बजे तक भी कोई साधन नहीं मिला तो मैंने रात्रि विश्राम के लिए एक होटल भी ढूंड लिया. रात का खाना भी उसी होते में मिल गया था. होटल काफी बड़ा था किन्तु रुकने वाले सिर्फ मेरे अलावा दो और यात्री. खैर सुबह होते ही मे तैयार होकर फिर सड़क पर खड़ा हो गया, अब गाड़ियों के आवाजाही शुरू हो गयी थी. परन्तु सभी गाड़ियाँ बुकिंग वाली थी जो हरिद्वार से ही यात्रियों द्वारा चार धाम या दुसरे धामों की यात्रा के लिए पहले से ही बुक कर ली जाती हैं. मैंने करीब १५ - 20 गाड़ियों को रुकने का इशारा किया किन्तु कोई भी नहीं रुका, मुझे अब निराशा सी होने लगी थी कि क्या अब मुझे आज गंगोत्री धाम के दर्शन किया बिना ही वापस जाना पड़ेगा. खैर मैंने सोचा चलो कुछ खा ही लिया जाय. एक होटल में आलू के परांठे खा लिए जिसमे आलू कि जगह समोसे का ही मसाला भर दिया गया था. चूँकि bhatwadi में गंगोत्री धाम के और जाने वाली गाड़ियों का कुछ लिखा पढ़ी भी होती हैं अतः कुछ गाड़ियाँ वहां कि पुलिस चेक पोस्ट पर रुक भी रही थी. रुकने वाली गाड़ियों के चालकों से भी मैं समय समय पर मुझे ले जाने के बारे में पूछ लेता था. किन्तु कोई भी तैयार नहीं हुआ, शायद दुसरे प्रदेशों से आने वाले यात्री किसी लोकल को अपने साथ ले जाने का विरोध करते होंगे उनकी अपनी सुरक्षा के लिए. मुझे परेशान होते हुए देख कर वहां तैनात पुलिस वालो में से एक ने मुझे बताया कि एक टैक्सी अभी आकर रुकी हैं जिसमे ड्राईवर के साथ एक ही आदमी जा रहा है. मैंने टैक्सी का नंबर देखा, हरयाणा का रजिस्ट्रेशन नंबर था. मैंने सोचा कि चलो ड्राईवर से बात करके देखता हु. ड्राईवर के पास गया था वो बेचारा ठण्ड के कारण खड़ा हुआ काँप रहा था, मैंने उससे बोला कि भाई थोडा धुप में खड़ा हो जाओ. मैंने उससे पुछा कि यार मुझे भी गंगोत्री जाना है, क्या ले चलोगे. वो थोडा सोचा और बोला कि साथ में एक साहब हा आप उसी से बात कर लो. मैं उस साहब के पास गया गुड मोर्निंग करके अपनी बारे में बताया. बातचीत से लगा कि ये सज्जन किसी दक्षिण भारतीय राज्य से है. भाई ने मेरा पूरा परिचय लिए और मुझे अपने साथ बिठा लिए. बातचीत में पता चला कि ये सज्जन काफी बड़े वकील हैं और कर्नाटक हाई कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं. उन्होंने अपना नाम रवि बताया. घूमना उनको भी प्रिय था. मैंने उत्तराखंड के विषय में उनको काफी जानकारी दी और एक दो जगह और घुमने कि सलाह दी. रास्ते में उन्होंने बताया कि वो पूरी रात सफ़र में थे अतः सीधे गंगोत्री न जाकर रास्ते में हर्षिल में एक होटल में रुकेंगे. उन्होंने बोला कि मैं उनके साथ भी चल सकता हु यदि कुछ और साधन न मिले तो. खैर हर्षिल तक मैं उनके साथ आया. रास्ते में बात करके उनसे अच्छी मित्रता भी हो गयी थी अतः मैंने उनका नंबर लिए और उनको अपना नंबर भी दिया. हर्षिल आने के बाद मैंने उनको सादर धन्यवाद् किया और फिर किसी और गाडी कि इंतज़ार करने लगा. १० मिनट तक कोई गाडी नहीं आयो तो मै पैदल ही चलना शुरू कर दिया. गंगोत्री धाम अब सिर्फ १९ किलोमीटर कि ही दुरी पर था. यह दुरी मेरे लिए पैदल चलने के लिए कोई ज्यादा नहीं थी. मैंने सोचा कि यदि कोई साधन नहीं भी मिलेगा तो मैं पैदल ही पहुँच जाऊँगा. वैसे अपनी किस्मत मै बराबर आजमाता रहा और सभी गंगोत्री धाम कि और जाने वाली गाड़ियों को हाथ देता रहा. किन्तु कोई सज्जन नहीं रुका. इसी बीच करीब 5 या 6 किलोमीटर कि दुरी तय भी कर चुका था, चलना बहुत अच्छा लग रहा था, ठंडा मौसम, एक और पहाड़ और जंगल दूसरी और बहती हुई गंगा जी. तभी पीछे से एक बस आती दिखाई दी मैंने उसको भी हाथ दिया. खैर कुछ दूर जाने के बाद पता नहीं क्या सोच कर ड्राईवर भाई ने बस को रोक दिया. मैं भागकर बस के पास पहुंचा तो मुझे ड्राईवर ने अपने पास ही केबिन में बैठने के लिए बुला लिया. मेरे बैठने के बाद ड्राईवर भाई जिसका नाम शशिकांत था बोला कि आप फौजी आदमी जैसे लगे इसलिए हमने आपको बिठा लिया, वरना हम लोग ऐसे किसी को नहीं बिठाते. क्योंकि दुसरे प्रदेशों के यात्री किसी को बैठने नहीं देते. मैंने कहा भाई मैं भारतीय नौसेना में रह चुका हु और फिलहाल एक शिक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत हु. मुझे बहुत अच्छा लगा कि अपने देश का आम आदमी सेना कि कितनी इज्ज़त करता है. यह बस भी कर्नाटक के यात्रियों द्वारा चार धाम कि यात्रा के लिए हरिद्वार से बुक कि गयी थी. उनका भी यमुनोत्री धाम हो चुका था तथा अब गंगोत्री धाम जा रहे थे. 

उन्होंने मुझे कहा कि हम लोग आज ही दर्शन करने के बाद वापस उत्तरकाशी आ जायेंगे आप हमारे ही साथ वापस आ जाना. मैं उनका स्नेहमयी आग्रह नहीं ठुकरा पाया. खैर गंगोत्री धाम आ ही गया था. उन्होंने सभी यात्रियों को 02 घंटे में वापस आने कि हिदायत देकर विदा किया. मैं भी दर्शन हेतु चला गया. गंगोत्री धाम तक चूँकि सीधे हे सड़क जाती हैं तो यहाँ यमुनोत्री धाम के मुकाबले काफी मात्रा में गाड़ियाँ तथा यात्री दिखाई पड़े. मैंने जल्दी से दर्शन किया और बाद में स्नान के लिए घात कि रताफ आ गया. जल्दी से स्नान करने के लिए माँ गंगा को नमस्कार करने के बाद स्नान किया, पानी काफी ठंडा था. खैर एक दो दुबकी लगाने के बाद बहार आया. 

अब लगभग 4 बज चुके थे अतः वापसी का समय होते देख कर मैं बस के पास पहुँच गया. यात्रियों को दोपहर का खाना खिलाकर शशिकांत भाई ने बस को स्टार्ट कर दिया. रास्ते भर बातें करते रहे, बातचीत में पता चला कि भाई काफी अवसरों पर ऐसे ही अनजान लोगों कि मदद कर चुके हैं. एक बार तो एक साधू बाबा को मुफ्त में ही चार धाम कि यात्रा इन्होने अपनी बस में करा दी थी. मुझे जान कर अच्छा लगा और मेरा मन उस अनजान ड्राईवर भैर शशिकांत के लिए श्रध्दा से भर उठा. खैर रात करीब 8 बजे बस उत्तरकाशी पहुँच गयी थी. उनके रुकने का इंतज़ाम किसी और होटल में था. अतः मैंने उनको थैंक्स बोल कर उनसे तथा यात्रियों से विदा ली. रात्रि विश्राम के लिए कमरा देख कर रात को उतरकाशी ठहर कर सुबह हरिद्वार के लिए रवाना हो गया.
इस प्रकार मेरी श्री यमुनोत्री और गंगोत्री धाम कि यात्रा इस दो महानुभावों कि मदद से पूर्ण हुई.
 शशिकांत भाई के साथ.