मेरी केदारकंठा ट्रेक गाथा,
इधर मुझे चकराता आये 04 वर्ष हो चले थे, वर्ष 2016 में में चकराता से ही यमुनोत्री व गंगोत्री धाम की यात्रा कर आया था । किंतु अभी तक मैंने कोई ट्रैकिंग नहीं की थी जैसा कि लोग बुकिंग करवा कर करते रहते हैं ।
यूं तो ट्रैकिंग में नाम पर मैं चकराता के ही आसपास काफी चलता रहता हूँ, सुबह निकल कर शाम तक वापस या फिर किसी गाँव मे ही रात के लिए रुक गया । नेवी के दिनों में एक बार किसी टेंट या कैम्प में रात बिताई तो थी, कोयम्बटूर के पास के जंगल में ।
मन मे तो था कि चलो कोई ट्रेक ऐसी भी कर ही लेता हूँ बुकिंग वाली तो अचानक से केदारकंठा का कार्यक्रम बन गया । मैं इसके लिए 17 अप्रैल को करीब 12.30 बजे चकराता से निकला, कि त्यूणी जाने वाली बस मिल जाएगी परंतु बस 12 बजे ही निकल गयी थी और अब कोई और दूसरी बस जाने वाली नहीं थी । मेरी उम्मीद अब किसी छोटी गाड़ी पर थी जो कि कभी कभार मिल ही जाती हैं । एक गाड़ी वाले से बात हुई उसने बोला जाएगा तो लेकिन सिर्फ कोटि कानासर तक ही । यानी मेरी कुल 80 किलोमीटर की यात्रा में से 30 किलोमीटर की यात्रा कम हो सकती है ।
मैं उसी के साथ चल दिया । बारिश हो ही रही थी रास्ते मे कुछ लोग उतरे और चढ़े भी । आखिरकार 2 घंटे के सफर के बाद मैं कोटि कानासर पहुंच ही गया । यहां उतर कर एक दुकान पर हाफ प्लेट चावल खाये और अब आगे जाने के लिए किसी गाड़ी की इंतजार करने लगा ।
मैं उसी के साथ चल दिया । बारिश हो ही रही थी रास्ते मे कुछ लोग उतरे और चढ़े भी । आखिरकार 2 घंटे के सफर के बाद मैं कोटि कानासर पहुंच ही गया । यहां उतर कर एक दुकान पर हाफ प्लेट चावल खाये और अब आगे जाने के लिए किसी गाड़ी की इंतजार करने लगा ।
एक मुर्गे वाली गाड़ी भी खड़ी थी, और एक बेकरी वाली गाड़ी भी । दोनों से पूछा कि भाई त्यूणी तक जाओगे तो मुझे भी ले जाना । दोनों बोले कि जाएंगे तो लेकिन रुकते रुकते ।
मैं इंतजार कर ही रहा था कि तभी एक कार आकर रुकी और मुझे लगा कि ड्राइविंग सीट पर कोई जाना पहचाना से व्यक्ति बैठा हुआ है,पास जाकर देखा तो देहरादून में रहने वाला एक मित्र ही था जो सावड़ा तक ही जा रहा था ।
यानी सावड़ा तक जाने का जुगाड़ हुआ और मेरे सफर से और 10 किलोमीटर कम हुए । सावड़ा पहुंच कर बारिश भी जोरों से होने लगी थी, और किसी दूसरी गाड़ी की भी कोई संभावना दिखाई नहीं पड़ रही थी । तभी एक गाड़ी आकर रुकी, जिसके ड्राइवर से कोटि कानासर भी बात हुई थी वह एक परिवार को त्यूणी से आगे हनोल, महासू देवता मंदिर तक ले जा रहा था । किंतु उसकी गाड़ी बुक थी तो उसने कोटि ही मना कर दिया था ।
सावड़ा आकर मैंने फिर से उससे पूछा कि भाई ऊपर ही बिठा लो अगर अंदर जगह नहीं है तो वह मुझे ऊपर बिठाने के लिए तैयार हो गया । शुक्र था कि बारिश भी थम चुकी थी । पहाड़ों में रहते हुए मुझे गाड़ी की छत पर बैठ कर सफर करने का अनुभव तो हो ही चुका था इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई ।
खैर उसने मुझे त्यूणी तक पहुंचा ही दिया मैंने भाई को धन्यवाद किया और किराए के पैसे भी देने लगा किन्तु उसने पैसे नहीं लिए । 17 अप्रैल की रात त्यूणी ही कटी और रात का खाना पांडेय जी के होटल में ही खाया ।
तयूनी से अब मुझे सांकरी पहुंचना था जहाँ से मेरी यात्रा प्रारंभ होनी थी । मुझे पता चला कि त्यूणी से सुबह 9 बजे एक बस उत्तरकाशी के लिए चलती है जो कि मुझे मोरी छोड़ देगी, यानी 25 किलोमीटर का सफर । मैं बस में बैठ गया और मोरी उतर गया । मोरी से अब मुझे और 25 किलोमीटर आगे जाना था उसके लिए मुझे पता चला कि एक बस बड़कोट से आती है और 11 बजे मोरी से सांकरी के लिए चलेगी । खैर बस आ गयी और 11 बजे मोरी के लिए रवाना हो गयी ।
मैं करीब 2 बजे सांकरी पहुंच गया बारिश अभी भी जारी थी । ढूंढते ढूंढते अपने रुकने की जगह भी पहुंच गया और कमरा इत्यादि ले लिया ।
कमरे में समान रखने के बाद मैं थोड़ा आसपास का जायजा लेने निकल पड़ा । सांकरी छोटी ही जगह है किंतु ट्रैकिंग का बेस कैम्प होने के कारण काफी ट्रेककर आते जाते दिखाई दिए । यहां से हरकी दुन और केदारकंठा के अलावा भी अन्य जगह की ट्रेक की शुरुआत होती है ।
रुकने का होम स्टे बहुत ही अच्छे स्थान पर बनाया गया है जहाँ से नीचे घाटी में बहती हुई टोंस नदी की आवाज सुनाई देती रहती है तथा सामने के पहाड़ से गिरता झरना भी दिखाई देता रहता है ।
बढ़ती ठंड के बीच मेरा मन चाय के लिए कर ही आया । मैंने अपने होमस्टे वाले सूरज भाई से चाय के लिए बोला तो भाई थोड़ी ही देर में चाय के साथ थोड़े आलू चिप्स भी दे गया । इतने शांत वातावरण में चाय और वह भी सामने दिखाई दे रहे ऊंचे ऊंचे पहाड़ व नीचे रूपिन नदी की कल कल करती आवाज ने चाय का मजा ही दोगुना कर दिया । अभी यहां 02 ट्रेकर और भी आने बाकी थे । खैर चाय पीकर मैं सांकरी का जायजा लेने के लिए बाहर निकल गया ।
थोड़ा बाजार की तरफ गया, बाजार में चहल पहल और काफी गहमा गहमी सी थी । कुछ गाड़ियों से हर की दुन से वापस आये ट्रेककर उत्तर रहे थे और उनका समान भी ।
कुछ ट्रेकर थके मांदे से केदार कांथा की ट्रेक से भी वापस आ रहे थे । मैंने वहां के बस स्टॉप से सुबह अलग अलग जगहों को जाने वाली बसों के टाइम का भी एक फोटो ले लिया ।
थोड़ा बहुत देर बाजार में घूम कर मैं वापस अपने होम स्टे आ गया । इसी बीच सूरज भाई ने रात्रि भोजन की भी सूचना दे दी । मेरे साथ ही बुक हुए बाकी दोनों ट्रेकर भी पहुंच चुके थे । जिनमें एक नवीद शाहिद, केरल से आया था मेरे ही कमरे में रुका, दूसरी शायद कोई लड़की थी जिससे मेरा परिचय नहीं हुआ । नवीद की यह पहली ही ट्रेक थी । हालांकि मैं पैदल तो काफी चलता रहता हूँ लेकिन इस प्रकार की ट्रेक का मेरा भी पहला ही अनुभव ही था ।
खैर खाना खाकर सो ही गए क्योंकि अगले दिन सुबह उठ कर केदार कांथा बेस कैम्प तक भी जाना था ।
अगले दिन नाश्ते के बाद हम तीनों लोग तैयार हो गए और हमारे साथ गाइड के रूप में चली कक्षा 12 की छात्रा अनुराधा जो कि खाली समय मे अपनी पढ़ाई के साथ ट्रेकिंग की गाइड का भी काम बखूबी कर लेती है ।
खैर हमारी ट्रेक शुरू हुई और थोड़ा ही आगे चल कर एक ग्रुप और भी मिल गया । फिर उनसे भी जान पहचान हो गयी और फिर चूंकि वो लोग चलने में थोड़ा तेज थे तो मैं अनुराधा, हमारी गाइड जिसको अब मैं अन्नू बुला रहा था को बोल कर उस ग्रुप के साथ आगे बढ़ गया ।
रास्ते मे एक जगह झोंपड़ी बनी दिखाई दी और घास का एक खूबसूरत सा मैदान । झोंपड़ी में स्थानीय लोगों ने दुकान बना रखी थी और जिसम चाय, मैगी, बन्द ऑमलेट इत्यादि मिल जाता है । मुझे चाय की चुस्की लेने के लिए जगह बढ़िया लगी, उसी स्थान पर एक और ग्रुप से मिलना हुआ जिसमें 04 गुजराती युवा अपने गाइड के साथ थे । गुजराती बंदे मिलते ही मैंने भी अपनी थोड़ी बहुत सीखी गुजराती में उनसे बातचीत की वह बड़े ही खुश हो गए ।
वहां से फिर लगभग 01 घंटे की ट्रेक के बाद हम अपनी मंजिल के अगले पड़ाव,जुड़ा का तालाब पर पहुंचे । यहां भी ट्रेकर कंपनी के टेंट इत्यादि उन लोगों के लिए लगाए गए थे जो इस ट्रैक को रुक रुक कर 04 दिनों में पूरा करते हैं ।
जुड़ा का तालाब पर साथ मे लिया गया पैक लंच भी किया जो कि एक सैंडविच थी और उस भूख में वह ऊंट के मुँह में जीरा ही साबित हुई । थोड़ा बहुत आराम कर फिर मुझे वहां एक ग्रुप और मिला जो कि हरयाणा से आये हुए थे और अच्छी रफ्तार से चल रहे थे । यहां से में इस ग्रुप के साथ बातचीत करता आगे बढ़ गया ।
इस ग्रुप के एक सदस्य की रास्ते मे ही तबियत खराब हो गयी जिसके कारण वो लोग भी रास्ते मे रुक रुक कर चल रहे थे । आगे जैसे जैसे चढ़ाई बढ़ती जा रही थी अब इस ग्रुप से भी मुझे आगे निकलना पड़ा और अब मैं अकेले ही बेस कैम्प की और बढ़ने लगा ।
जुड़ा का तालाब से करीब एक या डेढ़ घंटे चलने के बाद अब रास्ते मे बर्फ आनी शुरू हो गयी थी, रास्ते मे कुछ स्थानीय लोग वापस आते दिखाई दिए, जिन्होंने बताया कि बस बेस कैम्प अब ज्यादा दूर नहीं है । करीब 15 मिनट चलने के बाद मुझे एक ढलान पर लगे टेंट दिखाई दे ही गए और फिर मैं अपने दल के पहले सदस्य के रूप में मैं बेस कैम्प पहुंच गया । वहां अपने टेंट का पता करके समान इत्यादि रखने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए टेंट के अंदर लंबलेट हो गया ।
शाम के लगभग 4 बज चुके थे और चाय का भी समय हो चला था, अब धीरे धीरे बाकी के ट्रेकर भी बेस कैम्प पर जुटना शुरू हो गए थे । चाय इत्यादि पीने के बाद हमको बताया गया कि अगले दिन सुबह 3 बजे उठ कर 3.30 तक जरूर निकल पड़ना है, मुझे लगा कि इतनी सर्दी में कैसे उठ पाएंगे । जल्दी इसलिए चलना था ताकि सूर्योदय केदार कांथा शिखर से देखा जा सके ।
खैर मैं तो खाना खाकर अपने टेंट में स्लीपिंग बैग में घुस लिया और सुबह 2.55 का अलार्म भी लगा लिया । थोड़ी देर बाद मेरा साथी भी आकर सो ही गया ।
इसी बीच बगल के टेंट से किसी लड़की के चिल्लाने की आवाज से मेरी नींद खुली, पता चला कि ठंड के कारण उसके टेंट में चुपके से बाहर बैठा एक कुत्ता घुस गया था जिसे बाद में निकाला गया ।
खैर मैं वापस सोने का उपक्रम करने लगा, कि मन किया कि बाहर का एक दृश्य भी देख लूं, बेस कैम्प के चारों और बर्फ पड़ी हुई थी और चंद्रमा की रोशनी में नहाई बर्फ काफी सुंदर दिखाई दे रही थी । बाहर ठंड भी थी और कुछ कुत्ते हमारे टेंट के आसपास भी लेते हुए थे । मुझे बाहर आता देख एक कुत्ते ने जान पहचान करने के उद्देश्य से अपनी दुम हिलानी शुरू कर दी कदाचित वह मेरे टेंट में आकर सोने के चक्कर मे मुझसे जान पहचान बढ़ा रहा था, किन्तु भारी मन से मैं उस बेचारे को टेंट में अंदर आने का निमंत्रण नहीं दे पाया और फिर अंदर आकर सो गया ।
बाहर से निरंतर कुत्तों के भोंकने, और भी न जाने किन किन जीवों की आवाज़ें बराबर आ ही रही थी, और इधर मेरा केरल का साथी भी थक कर खर्राटे लेकर गहरी नींद में सो रहा था । वैसे उसने मुझे पहली ही रात इस बारे में आगाह कर दिया था कि वह खर्राटों लेता है ।
खैर पता नहीं कब मैं भी सो ही गया और सुबह अलार्म के साथ उठ भी गया था ।
कैम्प में उस समय उठने वाले मैं और मेरा साथी ही थे खैर हमने ब्रश इत्यादि किया और थोड़ी देर में बाकी लोग भी उठने लगे । थोड़ा नाष्टा व चाय पीकर हम अपने अगले सफर पर रवाना हुए । ऊपर जाकर मुझे फिर से वही कल शाम वाले गुजराती युवा व उनका गाइड मिल गए । में उन्ही के साथ आगे बढ़ गया ।यह अच्छा था कि आकाश में चंद्रमा की रोशनी छाई थी अतः सुबह 4 बजे भी हमको रास्ता सही दिखाई दे रहा था । जैसे जैसे चढ़ाई कठिन होती गयी मेरे और गुजराती दल व बाकी लोगों के बीच का फासला बढ़ता ही रहा और अब मैं केदार कांथा की तरफ अकेले ही आगे बढ़ने लगा ।
6 बजे के आसपास सूर्योदय होना शुरू हो गया था तो मैंने अपनी रफ्तार और भी बढ़ाई, इस पूरे रास्ते पर बर्फ ही पड़ी हुई थी जिस पर सावधानी से चलना था ताकि फिसल न सकें । खैर सूर्योदय के बाद अब चलने में अच्छा सा लगने लगा था, एक तो वातावरण में गर्माहट हो गयी थी दूसरे रास्ता व आसपास का दृश्य बहुत ही सुंदर भी दिखाई देने लगा था ।
बर्फ पर सूर्य की किरणों में बर्फ चमक उठी थी ऐसे मैं अब चश्मा लगा लेना जरूरी हो गया था । अब केदारकंठा की चोटी दिखाई देने लगी थी किन्तु सामने सीधी चढ़ाई दिखाई दे रही थी ।
चढ़ाई वाले रास्ते पर चलने के निशान दिखाई दिए तो मुझे लगा कि इसी रास्ते से ऊपर चलना होगा । बाकी सभी दल अब मुझसे काफी पीछे रह गए थे मुझे लगा कि यहां रुक कर उनका इंतजार करने से अच्छा होगा कि मैं ऊपर शिखर पर ही पहुंच जाऊ ।
सामने अब सीधी खड़ी चढ़ाई थी अब सिर्फ पैरों से ही चलना सम्भव नहीं था अतः हाथों का भी सहारा लेकर मैन ऊपर बढ़ना शुरू किया । करीब आधे घंटे की चढ़ाई के बाद रास्ता भी लगभग आधा तय हो चुका था, मैंने ऊपर शिखर को देखा और सोचा कि हाथ वाले इस डंडे की अब जरूरत नहीं है इसको ऊपर फेंक देता हूँ और ऊपर पहुंच कर वापस उठा लूंगा । मैंने डंडा ऊपर फेंका किन्तु चूंकि बर्फ सख्त थी अतः डंडा बर्फ में नहीं रुक पाया और नीचे की तरफ ही आने लगा जैसे ही डंडा मेरे पास को आया मैंने थोड़ा उचक कर उसको पकड़ना चाहा कि एकाएक बर्फ से मेरे ही पैर उखड़ गए और फिर मैं भी नीचे के चिकने से ढलान पर बड़े ही वेग से फिसलना शुरू हो गया । मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या हुआ और मुझे क्या करना चाहिए, मुझे लगा कि मैं वापस नीचे ही पहुंच जाऊंगा खैर मैंने रुकने की कोशिश की और रुक भी गया पर अब थोड़ा डर सा भी लगा क्योंकि इस तरह इतनी तेज रफ्तार से नीचे की तरफ बर्फ में फिसलने का मुझे कोई अंदाज नहीं था ।
खैर मैं फिर से ऊपर बढ़ा और इस बार निश्चय किया कि न तो बीच मे रुकना है और न ही नीचे की तरफ देखना है । खैर मैं ऊपर पहुंचा तो फिर नीचे से कुछ और भी लोग आते दिखाई देने लगे थे ।
पर यह क्या ?? वो लोग तो थोड़ा लंबे रास्ते से ऊपर शिखर की और बढ़ रहे थे, अब मुझे अपनी मूर्खता का अहसास हुआ कि मैं कितने गलत रास्ते से ऊपर की तरफ बढ़ गया था जो कि वास्तव में रास्ता है ही नहीं, कदाचित कुछ दिन पहले ताजी पड़ी बर्फ में कुछ लोग उस तरफ से ऊपर गए होंगे या ऊपर से नीचे फिसल कर आये होंगे उन्ही के वो निशान थे, किन्तु बर्फ अब ठोस हो चुकी थी जिस पर फिसलने का पूरा खतरा था ।
खैर मैं ईश्वर का नाम लेकर ऊपर तो पहुंच ही गया था अब मुझे नीचे दूसरे लोगों की आती हुई कतार सी दिखाई देने लगी थी और कोई भी उस रास्ते से नहीं आता दिखाई दिया जिससे आने की मूर्खता मैं कर बैठा था, कदाचित उन सभी को उनके साथ चल रहे गाइड लोगों ने इस बारे में आगाह कर दिया था ।
अब मुझे समझ आ चुका था कि इस प्रकार की अनजान ट्रेक पर बिना गाइड के चलना सही नहीं रहता । खैर ऊपर का दृश्य देख कर पूरी थकान दूर हो चली थी, कुछ पत्थर एक के ऊपर एक रख कर मंदिर का रूप दिया गया था मैंने सबसे पहले प्रभु केदार को मुझे सकुशल उनके दर्शनों हेतु पहुंचने पर आभार व्यक्त किया और आसपास के सुंदर दृश्य का आनंद लेने लगा । इसी बीच दूसरे दल के लोग भी ऊपर आने शुरू हो गए थे ।
अब मुझे समझ आ चुका था कि इस प्रकार की अनजान ट्रेक पर बिना गाइड के चलना सही नहीं रहता । खैर ऊपर का दृश्य देख कर पूरी थकान दूर हो चली थी, कुछ पत्थर एक के ऊपर एक रख कर मंदिर का रूप दिया गया था मैंने सबसे पहले प्रभु केदार को मुझे सकुशल उनके दर्शनों हेतु पहुंचने पर आभार व्यक्त किया और आसपास के सुंदर दृश्य का आनंद लेने लगा । इसी बीच दूसरे दल के लोग भी ऊपर आने शुरू हो गए थे ।
केदारकंठा शिखर आसपास के सभी पर्वत शिखरों से सबसे ऊंचा है अतः इसके चारों और घूम कर आप चारों तरफ यानी 360 डिग्री का व्यू ले सकते हैं ।
शिखर पर कुछ समय व्यतीत करने के बाद अब नीचे उतारना प्रारम्भ किया । पहाड़ों पर ऊपर चढ़ना फिर भी थोड़ा आसान होता है किंतु नीचे उतरने के समय फिसलने का ध्यान रखना पड़ता है । अब नीचे उतरने के समय सीधा ढलान सामने था, गुजराती दल के गाइड ने सलाह दी कि इस ढलान पर नीचे तक फिसल कर ही जाना सही रहेगा, अब चूंकि मैं एक बार इस फिसलने का अनुभव प्राप्त कर चुका था तो इसके लिए तैयार नहीं था किंतु और कोई चारा भी नहीं था उस रास्ते पर वैसे ही गिरने का खतरा रहता अतः हिम्मत जुटा का फिसल ही पड़ा चूंकि बर्फ सख्त थी और वहां से वापस जाने वाले लोग फिसल कर ही जा रहे थे तो फिसलने का रास्ता भी बन गया था । यह स्लाइड करीब 200 मीटर की रही होगी ।



































