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Friday, November 15, 2019

चूड़धार यात्रा, सिरमौर, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में लगभग 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चूड़धार महादेव व शीलगुर महाराज मन्दिर के विषय मे बहुत सारे लोगों से सुना था, स्थान के फोटो भी देखे और देख कर इस स्थान पर भी जाने की इच्छा हो ही उठी । साथ मे अपने साथी श्री आर्यन जी को बोला वो भी सहर्ष तैयार हो गए । चूड़धार की यात्रा तीन तरफ से की जा सकती है । हमने वहां तक पहुंचने के लिए हिमाचल की सीमा से लगे उत्तराखंड के त्यूणी नामक स्थान से अपनी यात्रा शुरू की । खैर हमने भगवान शिव का स्मरण किया और अपनी यात्रा सराह से चूड़धार हेतु आरम्भ कर दी । रास्ते की शुरुआत ही पास ही में हो रही एक स्कूल की सुबह की प्रार्थना के साथ हुई । सेब के बगीचे के बीच से एक पगडंडी से होते हुए फिर चूड़धार वाले मुख्य मार्ग पर पहुंच गए । ऊपर से दर्शन कर काफी यात्री वापस भी आ रहे थे जो कि शायद एक दिन पहले वहां पहुंच कर रात को रुकने के बाद वापस आ रहे थे । हमने उनसे

यात्रा के आरंभ में जितने भी लोगों से रास्ता इत्यादि पूछा सभी ने बोला कि वहां रात को तो रुकना ही पड़ेगा, एक ही दिन में वापसी संभव नहीं हो पाएगी । हमने सोचा कि चलो यदि वापस नहीं भी आ सके तो रात वहीं रुक जाएंगे । हमने अपनी यात्रा त्यूणी से कार द्वारा सुबह के करीब 7 बजे शुरू कर दी और अताल, मीनस पुल होते हुए  करीब 9 बजे हिमाचल के नेरवा नामक स्थान पर पहुंच गए । चूंकि सुबह नाश्ता नहीं किया था तो नेरवा में एक दुकान पर रुक कर दोनों ने दो दो परांठे खा लिए ताकि फिर पूरे दिन कुछ भी खाने की जरूरत न पड़े । जो लोग इस यात्रा को कर चुके थे उन्होंने बताया कि रास्ते मे चाय इत्यादि की दुकानें तो हैं । नाश्ता करने के बाद करीब 10 बजे हम सराह नाम की जगह पहुंच गए जहां से की चूड़धार महादेव की पैदल यात्रा शुरू होती है ।

सराह भी एक बहुत ही सुंदर और शांत जगह लगी, यहां दो अत्यंत विशिष्ट शैली में बने दो मंदिर भी दिखाई दिए । हमने अपनी यात्रा शुरू करने से पहले पानी इत्यादि लिया और चाय पीने एक दुकान पर बैठ गए । दुकानदार भाई से भी पूछा कि क्या हम आज ही वापस आ जाएंगे ?? उन्होंने भी बताया कि आज वापसी संभव नहीं होगी रात वहीं रुक कर सुबह आ जाना ।

हमने उनसे उनका ऊपर से चलने का समय पूछ कर अनुमान लगा कि इनको नीचे आने में कितना टाइम लगा और हमको कितना टाइम ऊपर तक जाने में लग जायेगा । हमने इस हिसाब से अंदाज लगाया कि हमको कम से कम 4 से 5 घंटे का समय ऊपर जाने में लग जाना चाहिए । और अगर हम 2 बजे तक ऊपर पहुंच गए तो फिर एक घंटा वहां रुक कर 3 बजे नीचे के लिए चलना शुरू कर देंगे और आराम से 6 बजे तक नीचे आ जाएंगे और फिर 9 बजे तक वापस त्यूणी भी पहुंच जाएंगे ।  चूड़धार की चढ़ाई करीब 9 किलोमीटर की है किंतु यह लगभग सीधी चढ़ाई का ही रास्ता है, रास्ते मे जंगल तो है लेकिन रास्ता काफी चौड़ा है और रास्ते पर कोई घास वगैरा नहीं जमी और रास्ता साफ सुथरा है ।  करीब 3 घंटे चलने के बाद हमे लगा कि हम बस अब पहुंचने ही वाले हैं, क्योंकि एक स्थान पर बहुत सारी चाय की दुकानें दिखाई दी, हमने एक दुकान पर रुक कर चाय पी और वहां रखे दिखाई दिए मावे के बने पेड़े । चाय के साथ इन पेड़ों का स्वाद बाद ही गजब का लगा । चाय पीकर और मावे के बने मीठे पेड़े खा शरीर मे जान सी आ गयी और फिर हम आगे को बढ़े ।

चाय की इन दुकानों को।पार करने के बाद हमे घास का एक बहुत बड़ा मैदान सा दिखाई दिया तथा वहीं ऊपर गुफा में एक दो मंदिर भी बने दिखाई दिए । लेकिन मुख्य मंदिर शीलगुर महाराज का और भी आगे था । खैर हम चलते रहे । करीब 1 बजे हम शीलगुर महाराज के मंदिर पहुंच गए, अब अगले लक्ष्य था वहां से ऊपर सबसे ऊंचे शिखर पर दिखाई दे रहे  शिवजी महाराज । खैर चूंकि अब भगवान शिव की उस ऊंचे शिखर पर विराजमान प्रतिमा के दर्शन होने शुरू हो गए थे तो मन एक जोश भी आ गया और मैं ऊपर की और बढ़ चला । मैंने शायद थोड़ा कठिन वाला रास्ता ले लिया था जो कि शीलगुर मन्दिर से बाएं हाथ की तरफ से होकर जाता दिखाई दिया । खैर करीब और 45 मिनट की चढ़ाई के बाद मैं ऊपर पहुंच ही गया और शिवजी के दर्शन किये । ऊपर से चारों तरफ का दृश्य बहुत ही सुंदर दिखाई दे रहा था, मन्दिर के पुजारी बाबा जी ने बताया कि इस स्थान से उत्तराखंड के चारों धाम के दर्शन भी हो जाते हैं और रात में तो चकराता की लाइट भी दिखाई दे जाती हैं । इसी बीच मेरे साथी आर्यन जी भी ऊपर पहुंच गए हमने कुछ फोटो और खींचे और शिवजी के दर्शन कर नीचे की और चले । नीचे आकर शीलगुर महाराज के भी दर्शन किये और फिर सराह की और बढ़ लिए । रास्ते मे रुक कर उसी चाय की दुकान पर चाय पी, पेड़े भी खाए और करीब 6 वजे हम वापस सराह पहुंच ही गए । उसी चाय की दुकान पर आकर फिर से चाय पी उनको थोड़ा ताज्जुब सा हुआ कि हम दर्शन कर वापस आ गए हैं । और इस प्रकार हमारी चूड़धार यात्रा समाप्त हुई ।

Wednesday, November 6, 2019

फारेस्ट डाक बंगले मुंडाली में एक रात







फारेस्ट डाक बंगले मुंडाली में एक रात ।
केदारकंठा ट्रैकिंग के बाद प्लान बना कि त्यूणी से kathyan व फिर पट्यूड गांव तक गाड़ी से जाकर वहां से मुंडाली फारेस्ट बंगले तक ट्रैकिंग कर रात वहीं गुजार कर अगले दिन वापस आया जाय । इसलिए हम मेंद्रथ से सुबह 9 बजे चल कर रास्ते मे एक दो स्कूल देखते हुए 12 बजे के आसपास kathyan पहुंच गए जो कि 2200 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटा सा पर सुंदर गांव है । वहां देबू भाई के होटल पर चाय पी और मेरे साथी के मना करने के बावजूद भी मैंने 10 रोटी और सब्जी पैक करा ही ली कि यदि फारेस्ट बंगले का चौकीदार नहीं भी मिला तो भूखे नहीं रहेंगे । इसी बीच कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि वहां से आगे खदम्बा नाम की जगह पर इस एरिया की सबसे ऊंची चोटी है जिस पर परी मन्दिर है और वहां भी जा सकते हैं । पहाड़ी क्षेत्रों  में आमतौर पर किसी भी स्थान पर सबसे ऊंचे स्थान पर किसी न किसी स्थानीय देवता का मंदिर होता ही है जिस पर साल के कुछ विशेष दिनों पर पूजा होती है । तो हमने मन मे निश्चय किया कि अगर सम्भव हुआ तो जौनसार, चकराता की सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान परी मन्दिर भी जरूर जाएंगे । हमने चलना शुरू किया और करीब 4 बजे इस जगह पहुंच गए जहां से एक रास्ता लाखामंडल की तरफ नाडा गांव जाता है, एक रास्ता खदम्बा और एक रास्ता फारेस्ट बंगले जाता है । वहां कितरोली गांव से  माफी की लकड़ी काटने वाले आये एक भाई से बात हुई रास्ता पूछा उसने बताया कि मन्दिर एक डेढ़ घंटे के रास्ते पर है और ठीक उसके ही नीचे फारेस्ट रेस्ट हाउस है । हमने चलना शुरू किया और एक चोटी दिखाई दी जो कि आसपास की सबसे ऊंची ही दिखाई दे रही थी । करीब 4 बजे हमने उस तरफ बढ़ना शुरू किया और सोचा कि 5 बजे तक ऊंचाई की तरफ बढ़ते रहेंगे और 5 बजे नीचे उतारना शुरू करेंगे ताकि सूर्यास्त से पहले ही डाक बंगले तक पहुंच सकें ।



[06/11 19:35]  ऊंचाई काफी थी जो कि app के मुताबिक 2975 मीटर थी अब इस ऊंचाई पर पहुंच जाने के बाद भी लेकिन किसी मंदिर के कोई निशान नहीं मिले, एक निराशा तो जरूर हुई पर यह छोटी सबसे ऊंची लग ही रही थी । खैर हमने अब डाक बंगले को देखना शुरू किया जिसके लिए नीचे उतारना था । हुम् नीचे उतरे पर डाक बंगला कहिं भी दिखाई नहीं दे रहा था । फिर मन मे आया कि चलो थोड़ा और आगे चलते हैं क्या पता मन्दिर मिल ही जाए । पर चूंकि अब सूर्यास्त भी हो चुका था और अंधेरा भी होने लगा था अतः हमने सोचा कि अब डाक बंगले की तरफ बढ़ना ही सही होगा । डाक बंगला ऊपर से कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा था और हम आगे बढ़ते ही जा रहे थे, चलते चलते मुझे कुछ लोगों की बातचीत की आवाज सुनाई दी, मैंने अपने स्थानीय साथी से बोला कि इनसे जौनसारी में पूछो की बंगला कहाँ है । चिल्ला कर पूछने पर उन भले लोगों की आवाज आई कि नीचे आ जाओ फिर रास्ता मिलेगा । हमने अंधेरे में ही नीचे उतारना शुरू किया और एक पगडंडी मिल गयी जिसको पकड़ कर हम अपने रास्ता बताने वाले लोगो तक पहुंचे । वो लोग लकड़ी काटने आये हुए थे और एक झोंपड़ी में आग जला कर बैठे हुए थे मन मे आया कि आज की रात इनके ही साथ गुजार दी जाय पर फिर सोचा कि इनके पास भी अपने ही हिसाब से कम्बल होंगे तो उनसे बंगले का रास्ता पूछते हुए पगडंडी से अंधेरे में मोबाइल की रोशनी में आगे बढ़ गए । करीब डेढ़ घंटे घने जंगल मे चलने के बाद हम आखिरकार बंगले पहुंच ही गए । बंगले में लाइट नहीं है, यह तो रास्ते मे ही पता चल गया था कि चौकीदार भी नहीं है किंतु कोई न कोई मिल ही जायेगा ।




[06/11 19:35] खैर हुम बंगले पहुंचे और ढूंढना शुरू किया कि कोई मिले और हमको रात गुजारने के लिए कमरा दे दे । अभी सितंबर में मैं बाइक से यहां तक आया ही था तो थोड़ा आईडिया था कि इनके कमरे पीछे हैं, हमने पीछे जाकर एक दो दरवाजे खटखटाये किन्तु किसी ने दरवाजा नही खोला, तभी मेरे साथी को एक कमरे के बाहर सोलर पैनल दिखाई दिया उससे अनुमान हुआ कि यह तो कोई न कोई जरूर होना चाहिए । खैर उस कमरे में रेडियो चलने की आवाज आई और एक आदमी से बात हुई ।
[06/11 19:35] वह हमें बंगले के केअर टेकर के कमरे ले गया जिसको हमने पहले ही खटखटाया था पर वो भी साढ़े सात बजे ही सो चुका था चूंकि।लाइट है नहीं जंगल है, अंधेरा हो ही गया तो बाहर करना ही क्या ।
[06/11 19:35] खैर भले आदमी ने हमको कमरा तो दे ही दिया किन्तु बोला कि खाना नहीं मिलेगा, मैंने बोला कोई बात नहीं कमरा ही दे दो खाना हमने ला ही रखा है तुमको भी खाना है तो आ जाओ । पर उसने माना कर दिया । आखिरकार अपनी लायी हुई रोटी काम आ ही गयी ।
रात के 9 बजने वाले हैं चौकीदार अपने कमरे में चला ही गया था साथ मे लायी हुई एक मात्र मोमबत्ती भी समाप्त होने वाली है मैं अभी कुछ देर बाहर गया था तारों से भरे आसमान को देखने और जंगल की रात की निस्तब्धता व शांति का अनुभव करने । अब वापस आया हूं, मेरा साथी थक कर चूर खर्राटें ले रहा है और अब मैं भी थोड़ी देर में जंगल की इस रात को महसूस करते करते मोमबत्ती के जलकर समाप्त होने पर सो ही जाऊंगा ।








कल रात लिखा था जंगल मे, नेटवर्क नहीं था आज ही शेयर किया । आज सुबह से अब शाम तक की बात अब लिखूंगा । तब तक यही पढ़ लीजिये 
रात को तो मैं भी करीब साढ़े आठ बजे सो गया था । थका हुआ तो था ही, सुबह साढ़े छः बजे ही आंख खुली । साथी अभी भी खर्राटें ही ले रहा था, मैं थोड़ा बाहर निकल आया, बाहर हरी घास पर ओस की बूंदें पाले की शक्ल में जम कर बर्फ पड़ने का भृम उत्पन्न कर रही थी । पक्षियों की चह चहचहाहट सुनाई दे रही थी तथा सामने की पहाड़ियां धूप से चमक उठी थी । हमको 8 बजे तक निकलना ही था अतः मैने साथी को जगाया और हम लोग रेडी होकर चौकीदार के कमरे पर आए । चौकीदार को हमने अपने साथ लाया दूध भी दे दिया किन्तु उसका मन शायद हमको चाय पिलाने का था ही नहीं, हमने भी उसको नहीं बोला, साथ मे लाये कुछ टमाटर भी उसको दिए और पैसे और अपनी मंजिल चकराता की सबसे ऊंची चोटी की तरफ बढ़ चले । सुबह हमने वही रास्ता पकड़ा जिससे हम रात के अंधेरे में बड़ी मुश्किल से बंगले तक पहुंच पाए थे । रास्ता एक पगडंडी ही था, खैर हम 8 बजे चल कर करीब 10 बजे तक खस्ति धार नामक जगह पर पहुंच ही गए । सुबह कुछ भी खाया पिया नहीं था, हालांकि रोटी तो बची थी कल रात की पर सोचा चलो पहले परी मन्दिर के दर्शन कर लें फिर कहीं बैठ कर पानी के आसपास रोटी गुड़ से खा लेंगे ।









देवी का यह मंदिर त्यूणी एरिया के सभी गांव को चकराता से जोड़ने वाले पैदल रास्ते पर था, पुराने समय मे गांव के लोग इन्ही रास्तों से चकराता बाजार आकर अपने लिए गुड़, नमक व अन्य सामान लेने आते थे ।
आजकल इस रास्ते पर वन विभाग की  लकड़ी ढोने वाले खच्चर व स्थानीय लोग चल लेते हैं । हमने इस मंदिर पर देवी माता को प्रणाम किया और अब वहां से दिखाई देने वाली सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ना शुरू कर दिया । इधर ऊंचाई बढ़ने के साथ साथ हवा की गति व ठंडक भी बढ़ने लगी थी, मैंने अपना मफलर निकाल कर कानों को ढका व ऊपर की और बढ़ना जारी रखा । करीब डेढ़ घंटे की खड़ी  चढ़ाई के बाद शिखर पर पहुंच कर मन मे संतोष हुआ कि चलो अच्छा हुआ कल नहीं बुलाया देवी माता ने, कल अंधेरा भी हो जाता व समय भी कम ही मिलता । आज मौसम भी साफ था तथा समय भी हमारे पास बहुत था । ऊपर कुछ लकड़ियों पर झंडियां लगाकर उनको मन्दिर का रूप दिया गया है और उसी स्थान को परी मन्दिर बोला जाता है और यह शिखर यहां सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित भी है । इसी बीच मेरा साथी भी शिखर पर पहुंच गया, हमने फ़ोटो खींचे तथा वहां की नरम घास पर लेट के अपनी थकान भी दूर की ।







करीब आधा घंटा शिखर पर बिताने के बाद हम नीचे उतरे और वापसी का रास्ता पकड़ा और तय किया कि कहीं पानी के पास बैठ कर एक दो रोटी खा लेंगे । करीब दो घंटे चलकर हम बामनिया नाम की जगह पर पहुंचे जहां से एक पैदल रास्ता नाडा गांव, एक रास्ता डाक बंगला, एक रास्ता त्यूणी और एक पुरोला की और जाता है । ये सब पैदल मार्ग थे जो जिनपर आजकल भेड़ बकरी वाले ही चलते हैं । वहीं वन विभाग का एक गोदाम था जिसमे लकड़ी ढुलान में लगे मजदूरों के लिए राशन रखा जाता है उसके चौकीदार ने हमे काली चाय पिलाई जिसके साथ हमने दो दो रोटी खाई और आगे की राह पकड़ी । और करीब 3 बजे पट्यूड पहुंच के अपनी पैदल यात्रा की समाप्ति की ।