Translate

Thursday, May 6, 2021

दूसरा दिन - कल्पा, रोघी, चितकुल और सांगला

दूसरे दिन मैं सुबह ही उठ कर रेकोंग पेय शहर का एक चक्कर ही लगा आया । हम हिमाचल सरकार के PWD रेस्ट हाउस में रुक गए थे जो कि काफी अच्छा बना हुआ था । पास ही में बस स्टैंड थे जहां जाकर मैंने चाय भी पी और वहां से चलने वाली बसों के टाइम के फोटो भी खींच लाया जो कि काम आ ही जाते हैं । जब तक मैं घूम कर आया तब तक मेरे साथी नहा धोकर तैयार हो चुके थे फिर मैं भी तैयार हुआ ।रेकोंग शहर है तो चकराता ही जितनी ऊंचाई पर लेकिन यहां से बर्फ से ढकी चोटिया चारों ही तरफ बहुत ही पास दिखाई देती रहती हैं जो कि अपने आप मे एक बड़ा ही सुंदर दृश्य है । यह दृश्य अब तक घूमे किसी भी पहाड़ी स्थान नैनीताल, मसूरी या चकराता से दिखाई नहीं देता । खैर हम पियो से कल्पा गांव की और बढ़े जो कि करीब 8 किलोमीटर दिखाया जा रहा था । सड़क अच्छी भली बनी हुई थी पर इसकी चौड़ाई कम ही थी । लगता है कि यही सड़क बहुत पहले हिंदस्तान तिब्बत मार्ग कहलाती थी जिसका जिक्र राहुल जी ने अपनी पुस्तक में किया है । कल्पा गांव जो कि पुराने समय किन्नौर जिले की एक तहसील हुआ करता था तिब्बत मार्ग पर पड़ने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव हुआ करता था । यही पर  वर्ष 1835 में बना सरकारी प्राइमरी स्कूल भी देखा । कल्पा गांव में एक अत्यंत पुराना बौद्ध मंदिर है तथा मंदिर के ही पास एक मंदिर । मंदिर सुबह उस समय बन्द मिला तो मैं बाहर से ही प्रणाम कर बौद्ध मंदिर की और बढ़ चला । बौद्ध अंदर खुला था तथा श्रद्धालु आ रहे थे उसी समय मंदिर में बौद्ध संगीत भी बजना शुरू हो गया जो कि वाकई एक अलौकिक अनुभव था । हमने बौद्ध मंदिर के दर्शन लिए जहां बृह्म कमल भी दिखाई दिए जो कि मंदिर में चढ़ाए गए थे । मंदिर के अंदर छोटी छोटी कटोरियों में पानी भर कर रखा गया था ।


कल्पा में अब भी कुछ पुराने घर बचे हैं जिनको देख कर लगता है कि यह कभी एक गांव हुआ करता था, अन्यथा तो अब यह हिमाचल का एक बहुत बड़ा टूरिस्ट अट्रैक्शन बन गया है । यहां की खास बात यही लगी कि चारों ही तरफ से बर्फ से ढकी चोटियों से घिरी है ये जगह जहां से चारों तरफ का दृश्य बहुत ही बढ़िया दिखाई देता है । इसके अलावा सेब के बगीचे और बहुत नीचे बहती सतलज इस स्थान की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं । कल्पा में ही नाश्ता करने का मन बनाया एक छोटे से ढाबे में गए जहां शायद हम पहले ही ग्राहक थे । गर्म गर्म परांठे खाये और वही मुलाकात हो गयी महाराष्ट्र से आई मेधा जी और उनके साथियों से । परिचय के बाद उनके साथ यह सेल्फी भी ली गयी ।


यहां नाश्ता करने के बाद किसी अन्य स्थान पर चाय पीने के लिए गए जिनके मालिक ने बताया कि उनका ढाबा घुमक्कड़ों ने यूट्यूब और फेसबुक पर काफी फेमस कर दिया है । मैंने भी उनके इस छोटे से ढाबे के फोटो लिए जिससे कि उनके फेमस ढाबे का मेरे पाठक भी दर्शन कर लें । 

चाय पीने के बाद हमने रोघी गांव के लिए सफर शुरू किया जिसके रास्ते मे ही सुसाइड पॉइंट नामक स्थान पड़ता था । खैर यह स्थान भी आ ही गया और वाकई काफी खतरनाक सी जगह है । नीचे बहुत ही गहरी खाई है जो कि किसी खड़ की है और जिसका पानी बहुत नीचे बहती सतलज यानी समुद्र में मिल जाता है । इस नदी को यहां लोग समंदर भी कह दिया करते थे ऐसा राहुल जी की पुस्तक में लिखा हुआ है । इसी खतरनाक जगह को सुसाइड पॉॉइन्ट कहा जााता हैै ।

यहां फ़ोटो खिंचवाना अपने ही आप मे एक रोमांचक अनुभव था ।
 
यही फिर से मिलना हो गया केरल के डॉक्टर लुकास जोसफ से जो 25 मार्च को केरल से अपनी मोटर साईकल से भारत भृमण पर निकले थे । कल भी इनसे किन्नौर के प्रवेश द्वार पर अचानक ही मिलना हो गया था । सुसाइड पॉइंट के बाद हमारा अगला पड़ाव बना रोघी गांव जो यहां से थोड़ी ही दूर था । वर्तमान में ये हैं मुख्य मार्ग पर नहीं रह गए क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग पीओ तक ही है । किंतु एक जमाने में शिमला से तिब्बत जाने वाली हिंदुस्तान तिब्बत पैदल मार्ग के ये महत्वपूर्ण पड़ाव हुआ करते थे । राहुल जी ने इन दोनों ही गांव का अपनी पुस्तक में बड़ा अच्छा वर्णन किया है । रोघी गांव - एक परिचय

हिमाचल के किन्नौर जिले में घुमक्कड़ों के बीच अत्यंत प्रसिद्ध हो चुके कल्पा गांव से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह रोघी नामक गाँव । पुराने समय के हिंदुस्तान - तिब्बत पैदल मार्ग पर स्थित हैं ये दोनों ही गांव । महान घुमक्कड़ राहुल जी की पुस्तक किन्नर देश मे पढ़ने से इन स्थानों की बड़ी ही रोचक जानकारी मिलती है । राहुल जी ने वर्ष 1948 ई में आज़ादी के एक ही वर्ष के बाद शिमला से तिब्बत सीमा पर स्थ्य नमग्या गांव तक का सफर पैदल किया था । उस समय कल्पा गांव को चीनी नाम से बोला जाता था तथा यह भी इस मार्ग पर पड़ने वाले अन्य गांव जैसा ही था । इस समय आज रेकोंग पीओ भी नहीं बसा और अब का हाईवे भी बाद ही में बन सका । यानी टापरी से ऊपर वाला हिंदस्तान तिब्बत पैदल मार्ग ही प्रचलित था । कालांतर में कल्पा गांव तो पर्यटकों के नक्शे पर आ गया किन्तु रोघी गांव आज भी शायद काफी कम ही लोग जाते हैं । जो साथी पुराने लकड़ी के बने घर देखना चाहते हैं उन्हें रोघी गांव तक जरूर जाना चाहिए व देखना चाहिए कि पुराने समय का जीवन कैसा होता होगा । कल्पा तो अब बस नाम मात्र का ही गांव बच रहा है । यदि गांव देखना ही है तो रोघी भी अवश्य जाएं । कुछ फोटो रोघी गांव के ।

रोघी गांव में आज बजी कुछ पुराने समय के मकान  दिखाई दे जाते हैं । रोघी गांव के बाद हम फिर स्वतंत्र भारत के पहले आप चुनाव के पहले मतदाता श्री श्याम शरण सिंह नेगी जी से भी उनके गांव कल्पा में आकर मिले जो अब 104 वर्ष के हो चुके हैं । इतने बुज़ुर्ग होने के बावजूद भी इन्होंने हमें बताया कि कैसे ये पहले वोटर बन सके । हुआ यूं कि हिमाचल के इस क्षेत्र में बर्फ बारी के कारण देश के बाकी हिस्सों से 6 माह पहले ही मतदान करा लिया गया था और जिस दिन वोट डाले गए ये सबसे पहले 6 बजे ही अपना वोट डालने पहुंच गए क्योंकि ये एक सरकारी अध्यापक थे और इन्हें भी अपनी ड्यूटी पर जाना था । लिहाजा इनके द्वारा ही आज़ाद हिंदुस्तान का पहला वोट डाला गया । इनके घर इनके एक पुत्र और इनकी पुत्र वधु मिले । इनके पुत्र का अब कल्पा में अपना होटल है जो इन्होंने लीज पर दे रखा है । इनका घर भी काफी पुराना बना हुआ है जिस पर वर्ष भी अंकित है । श्री नेगी जी से मिलने के बाद फिर हम अपने अगले सफर सांगला और चितकुल हेतु रवाना हो गए ।




इस गांव की वीडियो का लिंक

https://youtu.be/6LfgYVb8EH4