हमारे कैम्प में पदार्पण करते ही हमारा राजस्थानी स्टाइल में स्वागत शुरू हो गया. मैंने अपनी पीठ पर अपना बैग लाद रखा था तथा तिलक वगैरा लगाने के बाद जैसे ही हम कैम्प में अन्दर प्रवेश करने लगे तो एक सज्जन ने मुझे अपना बैग उतारने के लिए कहा मैंने सोचा कि यहाँ भी किसी सिक्यूरिटी चेक की जरुरत होगी लेकिन बैग उतारते ही एक दूसरा व्यक्ति मेरा बैग लेकर चलने लगा मैं कहा कि भाई आप क्यों कष्ट करते हो मैं ही ले लूँगा (फ़ौज की नौकरी में ऐसे बहुत से बैग बहुत बार रेलवे में सफ़र करने के दौरान मैंने ढोए हैं) किन्तु वह नहीं माना और बोला कि नही आप हमारे मेहमान हैं, मेरा मन प्रसन्न हो गया कि और सोचा कि यदि यह मेरा बैग भी नहीं ले जाता तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता पर उसने बैग लिया तो मुझे यह बात याद रही तथा यहाँ अपने पाठकों के साथ शेयर कर रहा हूँ.
खैर समान कैम्प में रखने के बाद हम बाहर आए जहाँ पहले से ही ढेर सारे लोग जमा होने शुरू हो गए थे. राजस्थानी कार्यक्रमों के लिए कैम्प में बीच में एक स्थान बनाया गया था जिसके चारों और कुर्सियां बिछाई गयी थी तथा जो लोग इस कार्यक्रम का मजा नवाबी अंदाज में लेना चाहते थे उनके लिए बाकायदा गद्दा तथा तकिया जमीन पर बिछा हुआ था. खैर हम लोग तो कुर्सी पर ही बैठ गए (एक रात के लिए क्या नवाब बनना था ). कार्यक्रम काफी अच्छा था विशेषकर नृत्य और गायन. कार्यक्रम के बाद डांस भी हुआ जिसमें शुरू में तो महिलाओं को ही बुलाया गया किन्तु फिर हम लोग भी चले गए तथा अपनी -अपनी शैली में डांस भी किया. डांस के बाद खाने का नंबर था, खाना राजस्थानी था तथा काफी स्वादिष्ट बना था.
खाना खाने के उपरांत सब लोग अपने-अपने कैम्प में चले गए हमें नींद तो आ नहीं रही थी इसलिए कैम्प के बाहर कुर्सी डाल कर बैठ गए. तभी एक बुज़ुर्ग से सज्जन मेरे पास आए तथा पूछने लगे कि यहाँ रात में रुकने में कोई दिक्कत तो नहीं होगी, मुझे लगा कि वो शायद वाहन रुकने में थोडा दर रहे हैं मैंने उन्हें समझाया तथा उन्हें आश्वस्त करने हेतु अपनी फौजी बैकग्राउंड का भी हवाला दे दिया (उससे उनका दर काफी कम स हुआ). खैर काफी देर बैठने के बाद सोने चले मौसम थी हो गया था तथा मुझे नींद भी नहीं आ रही थी तो मैं फिर कैम्प के बाहर ही आ गया तथा सोचा कि सोना तो फिर कभी भी मिल जाएगा पर रेगिस्तान में ऐसे बैठने का मौका फिर दोबारा लेने के लिए फिर इतना ही खर्चा करना होगा. मैं बाहर करीब 2 बजे तक बैठा तथा मैंने एक काफी आश्चर्यजनक बात नोट की, रेगिस्तान में मुझे कोई भी आवाज सुनाई नहीं दी, किसी पक्षी या जंगली जानवर गीदड़ वगैरा की. मेरे कान काफी ध्यान से कैसी भी आवाज सुनने को तरस गए, वैसे मैं अपने अध्यापक के दिनों में पहाड़ो में भी ऐसे स्थानों पर रात गुजार चुका हूँ किंतु वहां कोई न कोई आवाज बराबर आती रहती है किन्तु यहाँ कोई भी आवाज नहीं, यह काफी नया अनुभव रहा.
मैं सुबह भी जल्दी उठ गया था तथा तैयार होकर सूर्योदय का इन्तजार करने लगा (पश्चिम में स्थित होने के कारण सूर्य भगवान् ने भी आने में देर कर दी थी). सुबह मुझे ऊँट तथा पक्षियों की आवाज सुनाई दी. सूर्योदय के लिए कैम्प में रुके काफी लोग उठ कर पास ही के टीले पर गए, वही मुझे एक बंगाली बाबु मिले. बाद में कैम्प में वापस आकर नास्ता करने के उपरांत हमने कैम्प को अलविदा किया तथा जैसलमेर के लिए रवाना हुए. जैसलमेर से हमने फिर बाड़मेर के लिए बस पकड़ी और शाम को करीब चार बजे हम बाड़मेर पहुँच गए.
खैर समान कैम्प में रखने के बाद हम बाहर आए जहाँ पहले से ही ढेर सारे लोग जमा होने शुरू हो गए थे. राजस्थानी कार्यक्रमों के लिए कैम्प में बीच में एक स्थान बनाया गया था जिसके चारों और कुर्सियां बिछाई गयी थी तथा जो लोग इस कार्यक्रम का मजा नवाबी अंदाज में लेना चाहते थे उनके लिए बाकायदा गद्दा तथा तकिया जमीन पर बिछा हुआ था. खैर हम लोग तो कुर्सी पर ही बैठ गए (एक रात के लिए क्या नवाब बनना था ). कार्यक्रम काफी अच्छा था विशेषकर नृत्य और गायन. कार्यक्रम के बाद डांस भी हुआ जिसमें शुरू में तो महिलाओं को ही बुलाया गया किन्तु फिर हम लोग भी चले गए तथा अपनी -अपनी शैली में डांस भी किया. डांस के बाद खाने का नंबर था, खाना राजस्थानी था तथा काफी स्वादिष्ट बना था.
खाना खाने के उपरांत सब लोग अपने-अपने कैम्प में चले गए हमें नींद तो आ नहीं रही थी इसलिए कैम्प के बाहर कुर्सी डाल कर बैठ गए. तभी एक बुज़ुर्ग से सज्जन मेरे पास आए तथा पूछने लगे कि यहाँ रात में रुकने में कोई दिक्कत तो नहीं होगी, मुझे लगा कि वो शायद वाहन रुकने में थोडा दर रहे हैं मैंने उन्हें समझाया तथा उन्हें आश्वस्त करने हेतु अपनी फौजी बैकग्राउंड का भी हवाला दे दिया (उससे उनका दर काफी कम स हुआ). खैर काफी देर बैठने के बाद सोने चले मौसम थी हो गया था तथा मुझे नींद भी नहीं आ रही थी तो मैं फिर कैम्प के बाहर ही आ गया तथा सोचा कि सोना तो फिर कभी भी मिल जाएगा पर रेगिस्तान में ऐसे बैठने का मौका फिर दोबारा लेने के लिए फिर इतना ही खर्चा करना होगा. मैं बाहर करीब 2 बजे तक बैठा तथा मैंने एक काफी आश्चर्यजनक बात नोट की, रेगिस्तान में मुझे कोई भी आवाज सुनाई नहीं दी, किसी पक्षी या जंगली जानवर गीदड़ वगैरा की. मेरे कान काफी ध्यान से कैसी भी आवाज सुनने को तरस गए, वैसे मैं अपने अध्यापक के दिनों में पहाड़ो में भी ऐसे स्थानों पर रात गुजार चुका हूँ किंतु वहां कोई न कोई आवाज बराबर आती रहती है किन्तु यहाँ कोई भी आवाज नहीं, यह काफी नया अनुभव रहा.
मैं सुबह भी जल्दी उठ गया था तथा तैयार होकर सूर्योदय का इन्तजार करने लगा (पश्चिम में स्थित होने के कारण सूर्य भगवान् ने भी आने में देर कर दी थी). सुबह मुझे ऊँट तथा पक्षियों की आवाज सुनाई दी. सूर्योदय के लिए कैम्प में रुके काफी लोग उठ कर पास ही के टीले पर गए, वही मुझे एक बंगाली बाबु मिले. बाद में कैम्प में वापस आकर नास्ता करने के उपरांत हमने कैम्प को अलविदा किया तथा जैसलमेर के लिए रवाना हुए. जैसलमेर से हमने फिर बाड़मेर के लिए बस पकड़ी और शाम को करीब चार बजे हम बाड़मेर पहुँच गए.






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